उत्तराखंड का वो अद्भुत मंदिर...जहां ‘एकानन’ रूप में पूजे जाते हैं महादेव...
Apr 24 2017 8:53AM, Writer:मीत
उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थापित है रुद्रनाथ का दिव्य मंदिर। रुद्रनाथ मंदिर भगवान शिव जी को समर्पित धार्मिक स्थल है, जो पंचकेदारों में से एक केदार कहलाता है। समुद्रतल से 3600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित रुद्रनाथ मंदिर भव्य प्राकृतिक छटा से परिपूर्ण है। इस मंदिर की सबसे दिलचस्प बात ये है कि, इस मंदिर में भगवान शिव जी के एकानन, यानि कि मुख की पूजा होती है। इनके अन्य, बाकि बचे सम्पूर्ण शरीर की पूजा भारत के पड़ोसी देश नेपाल की राजधानी काठमांडू के पशुपतिनाथ मंदिर में की जाती है। आपने भारत के कई ऐसे मंदिरों के दर्शन किये होंगे, जो भगवान शिव जी को समर्पित हैं, और वहां उनके लिंग की पूजा की जाती है। पर केवल उनके मुख की पूजा, शायद ही कहीं की जाती है और मंदिर से जुड़ा यही अद्वितीय तथ्य इस मंदिर को सबसे अलग और रोचक बनाता है। यहाँ पूजे जाने वाले शिव जी के मुख को 'नीलकंठ महादेव' कहते हैं।
रुद्रनाथ मंदिर की यात्रा गोपेश्वर से शुरू होती है। उत्तराखंड के हिल स्टेशनों में एक गोपेश्वर, ऐतिहासिक मंदिर गोपीनाथ मंदिर के लिए लोकप्रिय है। इस मंदिर का ऐतिहासिक लौह त्रिशूल भी आकर्षण का केंद्र है। रुद्रनाथ की यात्रा के दौरान भक्तगण और यात्री इस गोपीनाथ मंदिर और लौह त्रिशूल के दर्शन करना नहीं भूलते।गोपेश्वर से फिर सगर गाँव तक की यात्रा की जाती है, जो रुद्रनाथ मंदिर की यात्रा का बस द्वारा अंतिम पड़ाव है। इसके बाद शुरू होती है इस मंदिर तक के लिए अकल्पनीय चढ़ाई। सगर से लगभग 4 किलोमीटर की चढ़ाई के बाद प्रारम्भ होती है, उत्तराखंड के सुन्दर बुग्यालों की यात्रा, जो पुंग बुग्याल से प्रारम्भ होती है।बुग्यालों और चढ़ाइयों को पार करके पहुँचते हैं पित्रधार नामक स्थान जहाँ शिव, पार्वती और नारायण मंदिर हैं। यहां पर यात्री अपने पितरों के नाम के पत्थर रखते हैं। रुद्रनाथ की चढ़ाई पित्रधार में खत्म हो जाती है और यहां से हल्की उतराई शुरू हो जाती है।
रास्ते में तरह-तरह के फूलों की खुशबू यात्री को मदहोश करती रहती है जो फूलों की घाटी सा आभास देती है। पित्रधार होते हुए लगभग 10-11 किलोमीटर बाद पहुंचते हैं आप अपने गन्तव्य, पंचकेदारों में तीसरे केदार, रुद्रनाथ मंदिर में। यहां विशाल प्राकृतिक गुफा में बने मंदिर में शिव की दुर्लभ पाषाण मूर्ति है, जहाँ शिवजी गर्दन टेढ़े किये हुए विराजमान हैं। माना जाता है कि, शिवजी की यह दुर्लभ मूर्ति स्वयंभू है, यानी अपने आप प्रकट हुई है और अब तक इसकी गहराई का पता नहीं लग पाया है। मंदिर के पास वैतरणी कुंड में शक्ति के रूप में पूजी जाने वाली शेषशायी विष्णु जी की मूर्ति भी है। मंदिर के एक ओर पांच पांडव, कुंती, द्रौपदी के साथ ही छोटे-छोटे मंदिर मौजूद हैं। मंदिर में प्रवेश करने से पहले नारद कुंड है, जिसमें यात्री स्नान करके अपनी थकान मिटाते हैं और उसी के बाद मंदिर के दर्शन करने पहुँचते हैं। रुद्रनाथ का समूचा परिवेश इतना अलौकिक है कि, यहां के सौन्दर्य को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है।