देवभूमि की ये जगह बेहद खास है...यहां भगवान विष्णु बाल रूप में अवतरित हुए थे!
Apr 25 2017 9:40PM, Writer:हैदर
देवभूमि चमत्कारों और नजाने कितने ही देवताओं के किस्से और कहानियों से भरा पड़ा है। हर देवता की कहनी कहीं ना कहीं देवभूमि से जुड़ी हुई है। ये धार्मिक मान्यताएं और देवताओं की खूबसूरत लीलाएं पहाड़ के लोगों को गौरवान्वित करती हैं। ऐसी ही एक कहानी जो भवान विष्णु से जुड़ी हुई उसके बारे आज हम आपको बताने जा रहे हैं। भवान विष्णु से जुड़ी ये मान्याता और कथा बेहद खास है। जिस जगह के बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं, ये वो जगह है जहां भगवान विष्णु बाल रूप में अवतरित हुए थे। हम सब जानते हैं भगवान देवभूमि में विराजते हैं। और यही वजह है कि लाखों और करोड़ों श्रद्धालु यहां आते हैं। और ये श्रद्धालु देवभूमि में शांति को तलाशते हैं। इन श्रद्धालिओं को देवताओं की पौराणिक कथाएं सुख का अनुभव करती हैं। ये वो कथाएं हैं जो सुख के अनुभव के साथ ही लोगों को जीने का रहा भी सीखाती हैं। इन कथाओं के जरिए ही हम अपने धर्म को समझते हैं। धर्म को अच्छी तरह से जानने और समझने के बाद उसे अपने जीवन में उतारने की कोशिश करते हैं। आइए अब आपको बदरीनाथ मंदिर की स्थाेपना की कहानी बताते हैं।
पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक जब गंगा नदी धरती पर अवतरित हुई, तो ये 12 धाराओं में बंट गई। बदरीनाथ के स्थान पर मौजूद धारा अलकनंदा के नाम से प्रचिलित हुई और ये जगह बदरीनाथ, भगवान विष्णु का वास बना। शंकराचार्य, आठवीं शताब्दी के दार्शनिक संत ने इसका निर्माण कराया था। पौराणिक किताबों में भी इस बात का सबूत मिलता है। चमोली जिले में स्थित बदरीनाथ में एक मंदिर है, इस मंदिर में विष्णु की वेदी है। ऐसा माना जाता है कि ये 2,000 साल से भी ज्यादा समय से एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान रहा है। बदरीनाथ की मूर्ति शालग्रामशिला से बनी हुई चतुर्भुज ध्यानमुद्रा में है। ऐसी मान्यता है कि ये मूर्ति देवताओं ने नारदकुण्ड से निकालकर स्थापित की थी। शंकराचार्य की प्रचार-यात्रा के समय बौद्ध अनुयायी तिब्बत जाते हुए मूर्ति को अलकनन्दा में फेंक गए थे। शंकराचार्य ने अलकनन्दा से इस मूर्ति को देबारा बाहर निकालकर स्थापना की। उसके बाद तदनन्तर मूर्ति दोबारा स्थानान्तरित की गई, और तीसरी बार तप्तकुण्ड से निकालकर रामानुजाचार्य ने इसकी स्थापना की।
शंकराचार्य ने अलकनन्दा से बदरीनाथ की मूर्ति को देबारा स्थापना के साथ ही देवभूमि में धर्म के गौरव को दोबारा स्थापित किया। जो अपने आप में कई अहम जीचों को दर्शता है। और ये बताता है कि कोई लाख शड्यंत्र रच ले लेकिन उसे देवताओं के खिलाफ कामयाबी नहीं मिल सकती। सनातन धर्म (हिन्दू धर्म) पूरी दुनिया को जीने की राह सीखाता है। और जिन देवातओं ने अपनी हमें जीने की राह दिखाई उनका वास उत्तराखंड में है। आइए अब आपको बताते है कि आखिर वो कौन सी जगह है जहां भगवान विष्णु बाल रूप में अवतरित हुए थे। उस जगह के मात्र स्पर्श से ही इंसान सुख का अनुभव करता है। और इसका कारण भगवान विष्णु का यहां अवतरित होना बताया जाता है। पौराणिक कथाओं और लोक कथाओं के मुताबिक नीलकंठ पर्वत के पास भगवान विष्णु ने बाल रूप में अवतरित हुए थे। पौराणिक कथाओं में बताया जाता है कि जहां भगवान विष्णु ने बाल रूप में अवतरित हुए थे वो पहले शिव भूमि (केदार भूमि) के रूप में जाना जाता था।