image: Success story of shashwat pandit part two

Video: पहाड़ी पावर के आगे झुक गई दुनिया...ऐसे हैं शेरदिल पहाड़ी... ’शाश्वत’ सत्य पार्ट-2...

May 26 2017 11:02AM, Writer:मीत

(इस कहानी के पहले पार्ट में हमने आपको शाश्वत पंडित का देवप्रयाग से देहरादून तक का सफर बताया था। 2 नंबरों की वजह से ओएनजीसी में नौकरी नहीं मिली थी। अब आगे…) आंखों में कई सपने थे, घर से वो निकल चुका था। वास्ता मंजिलों से था और सफर उतना ही मुश्किल। तो अब क्या किया जाए ? पता चला कि देहरादून में वॉयस ऑफ उत्तराखंड हो रहा है। शाश्वत ने भी इसमें हिस्सा लिया। रिजल्ट चौंकाने वाला था, शाश्वत रनर अप घोषित किए गए। वक्त बीतता जा रहा था और एक बार देहरादून की पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी में कई बड़े सितारों का प्रोग्राम हो रहा था। इसमें शाश्वत बीच में फिलर (ब्रेक के दौरान) गाने के लिए स्टेज पर आए। यकीन मानिए सितारों से ज्यादा लोगों को शाश्वत की आवाज अच्छी लगी। शाश्वत का दिमाग फिर कौंधा। दिल की धड़कनें अब संगीत को अपनाने के लिए धड़कने लगी। मेहनत शुरू हो गई, दिन में 18-18 घंटे गिटार बजाना शुरू किया।

जुनून ऐसा था कि हाथों से खून निकल जाता था। नींद को खुद पर कभी हावी नहीं होने दिया। मुंह में चायपत्ती रखकर रियाज करते थे, कि कहीं नींद ना आ जाए। शाश्वत देहरादून में किराए के मकान पर थे। मकान मालिक से बचने के लिए मोटरसाइकिल का हेलमेट पहनकर रियाज करते थे कि कहीं हल्ला सुनकर मकान मालिक घर से ना निकाल दे। जिस बेटे का परिवार चाहता था, वो वैज्ञानिक बने, उसके सिर पर तो कोई और ही धुन सवार हो गई थी। पागलपन की हद क्या होती है, वो शाश्वत को पता नहीं था। शायद वो हद पार हो गई थी। इसके साथ ही उत्तराखंड की म्यूजिक इंडस्ट्री में एक चमत्कार हुआ। पहली बार दो घंटे में कोई गाना तैयार हुआ, वीडियो तैयार हुआ और लोगों के सामने आया नए अवतार में ‘चिट्ठी किले नी भेजी’। पहाड़ी गानोंं को रिडिज़ायन किया जाने लगा। एक के बाद एक फ्यूज़न तैयार होने लगे। ये लड़का 11 इंस्ट्रूमेंट बजाता है, खुद गाता है, खुद रिकॉर्ड करता है।

कहते हैं ना कि काबिल बनिए, कामयाबी खुद आपके पीछे दौड़ी चली आएगी। शाश्वत का वक्त बदलने लगा था। दून इंटरनेशनल जैसे बड़े स्कूल में शाश्वत आज म्यूजिक के हेड ऑफ डिपार्टमेंट हैं। इसके बाद इस पहाड़ी बंदे ने एक और बड़ा काम कर डाला। यू-ट्यूब पर पहली बार दुनिया को गढ़वाली सिखानी शुरू कर दी। बताइए ऐसा कोई करता है भला ? नहीं ना...इसने कर दिया। अमेरिका, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और दुनिया के जितने भी मुल्कों में गढ़वाली रहते हैं, उन्हें शाश्वत गढ़वाली बोलना सिखा रहा है। यकीन मानिए शाश्वत के इस पहाड़ी पाठ को सुनने के लिए 80 फीसदी लोग भारत से बाहर के होते हैं। आज शाश्वत एक बेहतर मुकाम पर हैं। देहरादून में होने वाले जिस विरासत के स्टेज पर जाने का सपना शाश्वत ने देखा, वो पूरा हुआ। शाश्वत करहे हैं कि एक पीढ़ी उन्हें याद करे, वो कुछ ऐसा करना चाहते हैं। वो कहते हैं कि उत्तराखंड से एक रॉक स्टार होना चाहिए। राज्य समीक्षा का ऐसे पहाड़ी जिगर वाले बंदों को सलाम। जय उत्तराखंड (ये कहानी आपको कैसी लगी? अपनी राय जरूर दीजिएगा)


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