इस भयंकर समस्या से कैसे पार पाएगा उत्तराखंड ? ये जख्म तो नासूर बन गया है
Jun 13 2017 6:35PM, Writer:आनन्द मेहरा, अल्मोड़ा
उत्तराखंड यानी देवभूमि अपने नैसर्गिक सौंदर्य और अपार जल सम्पदा से सुसज्जित हैं। नौ नवंबर , 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर तमाम उम्मीदों के साथ ये राज्य अस्तित्व में आया। अपना राज्य , अपना विकास के मुख्य उद्देश्य से बना ये राज्य कब राजनीति और राजनेताओ के बीच उलझ गया , पता ही नहीं चला। पलायन एक ऐसी भयंकर त्रासदी है जिसे यह राज्य आज जूझ रहा हैं और इसके बाशिंदे ना-उम्मीदी के डर से शहरो और दूसरे राज्यों की तरफ चले गए हैं। इस राज्य की इस त्रासदी से ना उभरने के लिए सरकारें दोषी हैं। पहाड़ो में अकूत सम्भवनाएं हैं। पर्यटन , औषधि , फल-फूल ये ऐसे क्षेत्र हैं जो इन पहाड़ो को फिर से आबाद कर सकते हैं। बस जरूरत है तो चिन्हित करने की और उस दिशा में काम करने की। पहाड़ी नौजवानो को शहरो में दिहाड़ी मजदूरी करते देखना अपने आप में एक दयनीय अनुभव हैं। खुली आबोहवा और स्वच्छ जल पीने का आदी वो नौजवान घुट घुट कर जीने को मजबूर हैं।
क्योंकि उसे अपने पहाड़ो में रोज़गार की कोई सम्भावना नहीं दिखती। इसका समाधान क्या है इस बारे में हम आपको बता रहे हैं। उत्तराखंड का प्रत्येक गावं कोई न कोई विशेषता लिए हैं। जरुरत हैं सरकार को गांव स्तर पर काम करने की। एक एक गांव को उसकी विशेषता के लिए चुना जाये और उस पर काम किया जाये। जो गावं तलाउ में बसे हैं , उनकी लिए अलग नीति हो और जो गावं उपराऊ जमीन लिए हैं , उनके लिए अलग नीति हो। गांवो को सड़क मार्ग से जोड़ने का कार्य युद्धस्तर पर किया जाये और गांव के लोगो को मनरेगा के तहत सिर्फ खानापूर्ति के लिए काम न कराया जाय। पहाड़ी आदमी मेहनतकश, सीधा और सरल होता है और अगर आप उसकी ऊर्जा सही दिशा में लगाएंगे तो परिणाम आना तय हैं। हमारे जंगल हमारी सम्पदा हैं और ये सिर्फ चीड़ के लिए नहीं हैं। इन जंगलो में सिलसिलेवार और किस्म के पेड़ो के लगाया जाय। आज की दुनिया इंटरनेट से जुडी है।
पहाड़ो की घाटियों में ऐसे कंपनियों को लाया जाये जो इंटरनेट के माध्यम से अपनी सेवाएं देती हैं। यहां न केवल रोज़गार मिलेगा अपितु संचार और मूलभूत सुविधाओं का विस्तार होगा। आज शहरी लोग , शुद्ध और कीटाणु मुक्त - फल और सब्जी के लिए तरस रहे हैं और ये क्षेत्र हम पहाड़ियों के लिए वरदान साबित हो सकता हैं। शुद्ध परिवेश में उपजायी फल और सब्जियां हमारे लिए रोज़गार के नए क्षेत्र विकसित कर सकती हैं। फिल्म निर्माण के लिए शूटिंग करने के लिए हमारे फिल्म उद्योग के लोग विदेशो का दौरा करते हैं जबकि उत्तराखंड का नैसर्गिक सौंदर्य उन्हें अपनी और खींच सकता हैं। हमारे पहाड़ और घाटियाँ कही से भी स्विट्ज़रलैंड से कम नहीं हैं। आम लोग और सरकार के बीच तालमेल होना बहुत जरुरी हैं। पलायन को रोकना ही काम नहीं हैं , जो छोड़ चुके हैं उन्हें भी घर वापस लाना हैं। और यह तभी संभव हैं जब हम उन्हें विश्वास दिला सके कि आइये , उत्तराखंड में अब अपना भविष्य तलाश सकते हैं। कौन अपनी जन्मभूमि से जुड़ना नहीं चाहता , सबके दिलो में आज भी पहाड़ धड़कता हैं।