Video: ये तीन पहाड़ी बेमिसाल हैं, शहर छोड़कर गांव गए, हुनर से इतिहास की ‘रंचणा’
Jun 14 2017 11:57AM, Writer:मीत
एक कहानी जो शायद आज उत्तराखंड का हर शख्स पढ़ना चाहता है। वो कहानी जो कभी कल्पना से परे लगती थी लेकिन अब विश्वास है कि वो सत्य कथा है। ‘पांडवाज’ इस सत्य कथा के सबसे बड़े किरदार हैं। कुछ लोग रोना रोते हैं कि उत्तराखंड के गावों में रहकर कुछ नहीं हो सकता, बाहर तो जाना ही पड़ेगा। ऐसे लोगों के लिए कुछ कद्दावर लोग मिसाल पेश करते हैं। उस मिसाल की मशाल इन ‘पांडवाज’ के हाथों में भी है। आसमान छू लेने वाली सोच साथ में लिए चलते हैं ‘पाडवाज’। ईशान डोभाल, कुणाल डोभाल और सलिल डोभाल आज सिर्फ पांडवाज नहीं रह गए हैं, वो उत्तराखंड की उम्मीद बन रहे हैं। आपने ‘रंचणा’ सुना होगा, आपने ‘घुघूती’ और ‘फुलारी’ सुना होगा। आखिर ऐसा क्या रखा है इन गीतों में ? क्यों हमारे कान बार बार ये सुनना चाहते हैं ? क्यों इन गीतों को सुनकर आत्मा को इनके बोल चीरते हैं, कचोटते हैं ? वजह सिर्फ एक है कड़ी मेहनत, कड़ी लगन और अपनी मातृभूमि से अटूट प्यार। बस इन तीन शब्दों का ही फलसफा हैं ‘पांडवाज’।
सबसे बड़े हैं ईशान, फिर कुणाल और फिर सलिल। तीनों अपने अपने हुनर के उस्ताद हैं। तीनों भाईयों ने ये भी सिखाया है कि परिवार एक हो, तो कोई भी काम मुश्किल नहीं होता। पिता श्री प्रेम मोहन डोभाल प्रिंसिपल रहे हैं और कला के क्षेत्र में उन्होंने नाम कमाया है। कहते हैं अगर आपके दिल में कुछ करने का जुनून उबाल मार रहा है तो आप सही रास्ते पर जा रहे हैं। ईशान के दिल में ये जुनून ना जाने कबसे था लेकिन मंजिल कहां है ये पता नहीं था। एक दिन ईशान के दिल में ये ख्याल आया कि एक छोटा सा स्टूडियो खोला जाए। वो वक्त शायद ईशान अपनी जिंदगी में कभी नहीं भूलना चाहेंगे। कौन जानता था कि ये छोटा सा स्टूडियो पूरे उत्तराखंड को बड़ी सौगात देने के लिए तैयार हुआ है। शुरुआत में एक-दो गानों पर प्रयोग किया तो अच्छी प्रतिक्रिया मिली। छोटे भाई कुणाल उस वक्त दिल्ली में थिएटर कर रहे थे। ईशान ने कुणाल को वापस श्रीनगर बुला लिया। सलिल पेंटिंग्स के छात्र थे तो उनमें फोटोग्राफी का जुनून जाग गया। यहां से शुरू होती है पांडवाज की सफलता की कहानी।
तीनों भाई एक साथ और तैयार हुआ ‘पांडवाज’ क्रिएशन। बस फिर क्या था। दुनिया के सामने पेश हुआ उत्तराखंड के सबसे अद्भुत गीतों में गिना जाने वाला ‘रंचणा’। खास बात ये है कि इस गीत के साथ बैंगलोर से सौदामिनी जी भी जुड़ी। शास्त्रीय संगीत और गढ़वाली में पहला ऐसा गीत तैयार हुआ, जिसने उत्तराखंड ही नहीं देश की आंखें खोल दी। गजब क्रिएशन को जन्म दे चुके थे पांडवाज। इसके बाद इन तीनों ने उत्तराखंड के कवियों को देश के सामने पेश किया। गजब की सोच थी तो सफलता मिलनी ही थी, ये आइडिया हिट रहा। आत्मविश्वास से लबरेज पांडवाज अब आगे बढ़ रहे थे। सपना बड़ा था, लेकिन सपने को हकीकत में बदलने के लिए मदद चाहिए थी। मदद देश से नहीं बल्कि विदेश से आई, वो भी अपने लोगों के जरिए। न्यूजीलैंड में रहने वाले हीरा सिंह राणा, दान सिंह राणा, राज बलूनी ने पांडवाज को मदद की। दिल्ली से संजय कुगशाल जी और दिवाकर उनियाल जी ने भी हाथ बढ़ाया। बिना स्वार्थ के पांडवाज का साथ दिया और शायद इसे पांडवाज कभी नहीं भूल सकते।
अब बारी आई ‘घुघूती-बासुती’ की, ये वो दौर था जब उत्तराखंड में डीजे वाले गाने चल रहे थे, मतलब इसके अलावा लोग कुछ सुनना ही नहीं चाहते थे। लेकिन रुख बदला, हवा बदली और तैयार हुआ टाइम मशीन सीरीज का पहला गीत ‘घुघुती’। ऐसा उत्तराखंड ने कभी नहीं देखा था। चोट सीधा दिल पर लगी थी, असर कानों में हो रहा था, कुछ मीठी सी याद में हर पहाड़ी खो गया था। हमारे बचपन को कहां से चुरा लाए ‘पांडवाज’ ? वो बचपन जो पूरे उत्तराखंड ने जिया, वो अचानक हमारी आंखों की स्क्रीन के सामने फुल एचडी वीडियो बनकर आया था। अद्भुत कल्पना थी, विदेशों में रहने वाले पहाड़ी बरबस आंसू छलकाने लगे थे। जो हमने जिया है, बस वो दिखा रहे हैं पांडवाज और ये ही तो हम देखना चाहते हैं। आगे क्या हुआ ? कैसे बना टाइम मशीन सीरीज का अगला गाना फुलारी ? किसकी सोच थी फुलारी ? फुलारी के बाद क्या नया आने वाला है ? किस शूटिंग के लिए लेह लद्दाख गए थे पांडवाज ? टाइम मशीन-3 में क्या खास है ? इस कहानी के अगले पार्ट में बताएंगे। कल दोपहर 12 बजे का इंतजार कीजिएगा।