image: Phulari in uttarakhand belongs to rome says history

उत्तराखंड में कहां से आए ‘फुलारी’ ? आज जानिए ‘फूलदेई’ का ‘रोम’ कनेक्शन !

Jul 22 2017 9:28PM, Writer:शैलजा

फूलदेई चैत्र संक्रांति को मनाया जाता है और फूलों से जुड़े होने के कारण इसे फूल संक्रांति भी कहते हैं। उत्तराखंड में इसका खास महत्व है। ये बच्चों का त्योहार है जो इसे विशेष बना देता है। ये बसंत ऋतु के आगमन का त्योहार है। बच्चे सुबह लेकर घर घर फूलों की डाली लेकर बसंत का स्वागत करते हैं। फूल संक्रांति प्रकृति से जुड़ा त्योहार है। बसंत अपनी छटा बिखेरना शुरू कर देता है। बसंत के आगमन के साथ ही बुरांश, आड़ू, मेलु, खुबानी, पुलम खिलने लगते हैं और सरसों के फूल इसकी छटा में चार चांद लगा रहे होते हैं। बच्चों और खासतौर पर अविवाहित लड़कियों के लिये बसंत का आगमन विशेष महत्व का होता है। गांव की लड़के और लड़कियां चैत्र संक्रांति से एक दिन पहले ही शाम को फूलों को रिंगाल की टोकरी में एकत्रित कर देते हैं। फूलों के साथ गेहूं और जौ की नन्हें पौधों की हरियाली भी लायी जाती है। बच्चे सुबह लेकर नहाने के बाद प्रत्येक घर में जाकर फूलों और हरियाली को दहलीज पर चढ़ाते हैं।

बच्चे उनकी सुख शांति और समृद्धि की कामना करते हैं। घर की गृहणियां इससे पहले गाय के गोबर से घर और देहरी को लीप के रखती है। घर की देहरी पर ऐपण सजाकर चावल और गेहूं रखा जाता है जो फूल लेकर आने वाले बच्चों को दिया जाता है। बसंत के पूजन की यह परंपरा असल में रोम से शुरू हुई थी। रोम की पौराणिक कथाओं के अनुसार फूलों की देवी का नाम 'फ्लोरा' था। इसको लेकर वहां कुछ कहानियां भी हैं। वहां फूलों से सजी एक खूबसूरत किशोरी के रूप में बसंत को पूजा जाता है। 'फ्लोरा' शब्द लेटिन भाषा के 'फ्लोरिस' से लिया गया है जिसका अर्थ होता है 'फूल'। वहां इसके लिये विशेष तौर पर 6 दिन तक 'फ्लोरिया महोत्सव' मनाया जाता था जिसमें देवी 'फ्लोरा' यानि बसंत की पूजा होती थी। इसी तरह से यूनान में एक देवी क्लोरिस की पूजा की जाती थी। रोमन कवि पबलियस ओविडियस नासो की किताब 'फास्टी' में एक पौराणिक कथा का जिक्र है। इस कथआ के बारे में आपका जानना जरूरी है।

जिसके अनुसार क्लोरिस को पश्चिमी हवा के अवतार और बसंत के जनक जेफाइरस ने चूमा जिससे वो 'फ्लोरा' में तब्दील हो गयी। ये भी कहा जाता है कि सैबाइन जाति के राजा टाइटस टैटियस ने रोम का इस देवी से परिचय कराया था। देवी 'फ्लोरा' का 268 ईसा पूर्व में पहला मंदिर बनाया गया था और 238 ईसा पूर्व से 'फ्लोरिया महोत्सव' 28 अप्रैल से तीन मई के बीच मनाया जाने लगा। आज भी वहां कुछ स्थानों पर विशेषकर पहाड़ी क्षेत्रों में इस महोत्सव का आयोजन होता है। रोम में ये सूर्य पर आधारित कैलेंडर की शुरुआत होती है जबकि हिन्दू धर्मग्रंथों के अनुसार सूर्य कैलेंडर की शुरुआत चैत्र संक्रांति से मानी जाती है। फ्लोरा को रोम में एक ऐसी देवी के रूप में प्रदर्शित किया जाता है जो बासंती वस्त्रों में लिपटी है, जिसके हाथों में फूलों की टोकरी और सिर पर फूल और पत्तों का मुकुट है। फूलों से बनने वाला शहद इस देवी को अर्पित किया जाता है। 'फ्लोरा' नाम अब भी वहां पेड़ पौधों के लिये उपयोग ​किया जाता है। (ये ब्लॉग घसेरी डॉट ब्लॉगस्पॉट से लिया गया है, जिसके लेखक धर्मेंद्र पंत जी हैं )


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