उत्तराखंड को पीएम मोदी का प्रणाम, अब दे दिया ये बड़ा तोहफा !
Jul 23 2017 11:26AM, Writer:शोभित
मोदी सरकार ने देश की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के लिए देश भर में 25 आदर्श स्मारकों का सलेक्शन किया है। इन स्मारकों की सैर के लिए आने वाले पर्यटकों से ही इनकी स्वच्छता और के बारे में बकायदा इंटरव्यू लेकर जानकारी हासिल की जाएगी। इन पर्यटन स्थलों को और अधिक बेहतर बनाने के लिए सुझाव भी लिए जाएंगे। उत्तराखंड के जागेश्वर धाम को भी इन आदर्श स्मारकों में शामिल किया गया है। सभी आदर्श स्मारकों के लिए नोडल अधिकारी तैनात करने के निर्देश दिए हैं। इससे इस प्रक्रिया को जल्द से जल्द शुरू किया जा सके। दरअसल भारत सरकार ने स्वच्छ भारत मिशन के तहत इन 25 ऐतिहासिक स्थलों को आदर्श स्मारकों को रूप में सलेक्ट किया है। इन स्थलों में वाई-फाई सुविधा देने के साथ ही कैफेटेरिया, पार्किंग, हाईटेक शौचालय और सुरक्षा भी मुहैया कराई जाएगी। उत्तराखंड से इसके लिए जागेश्वर धाम को चुना गया है।
अल्मोड़ा जिले के ऊंचे घने हरे देवदार वृक्षों के बीच 1870 मीटर की ऊंचाई में बसा जागेश्वर धाम दुनिया में प्रसिद्ध कहै। इसे भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। यहां छोटे-बड़े प्राचीन मंदिरों की संख्या करीब 250 है। अब इस विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्मारक की सैर करने वाले पर्यटक स्वच्छता के बारे में आपना फीड बैक देंगे। उत्तराखंड के अल्मोड़ा से 35 किलोमीटर दूर स्थित है जागेश्वर धाम। प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर ये क्षेत्र सदियों से आध्यात्मिक जीवंतता प्रदान कर रहा है। यहां लगभग 250 मंदिर हैं जिनमें से एक ही स्थान पर छोटे-बडे 224 मंदिर स्थित हैं।उत्तर भारत में गुप्त साम्राज्य के दौरान हिमालय की पहाडियों के कुमाऊं क्षेत्र में कत्यूरीराजा थे। जागेश्वर मंदिरों का निर्माण भी उसी काल में हुआ। इसी कारण मंदिरों में गुप्त साम्राज्य की झलक भी दिखलाई पडती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अनुसार इन मंदिरों के निर्माण की अवधि को तीन कालों में बांटा गया है।
कत्यूरी काल, उत्तर कत्यूरीकाल एवं चंद्र काल। बर्फानी आंचल पर बसे हुए कुमाऊं के इन साहसी राजाओं ने अपनी अनूठी कृतियों से देवदार के घने जंगल के मध्य बसे जागेश्वर में ही नहीं वरन् पूरे अल्मोडा जिले में चार सौ से अधिक मंदिरों का निर्माण किया जिसमें से जागेश्वर में ही लगभग 240 छोटे-बडे मंदिर हैं। मंदिरों का निर्माण लकडी और सीमेंट की जगह पत्थर की बडी-बडी शिलाओं से किया गया है। दरवाजों की चौखटें देवी देवताओं की प्रतिमाओं से अलंकृत हैं। मंदिरों के निर्माण में तांबे की चादरों और देवदार की लकडी का भी प्रयोग किया गया। जागेश्वर को पुराणों में हाटकेश्वर और भू-राजस्व लेखा में पट्टी पारूण के नाम से जाना जाता है। पतित पावन जटागंगा के तट पर समुद्रतल से लगभग पांच हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित पवित्र जागेश्वर की नैसर्गिक सुंदरता अतुलनीय है। कुदरत ने इस स्थल पर अपने अनमोल खजाने से खूबसूरती जी भर कर लुटाई है। लोक विश्वास और लिंग पुराण के अनुसार जागेश्वर संसार के पालनहार भगवान विष्णु द्वारा स्थापित बारह ज्योतिर्लिगों में से एक है।