गोमुख से मिले ‘प्रलय’ के सबसे बड़े संकेत, 150 मीटर खिसकी भागीरथी !
Jul 30 2017 11:56AM, Writer:kailash
हम लगातार आपको बताते रहे हैं कि किस तरह से गोमुख इस वक्त बड़ा खतरा बनता जा रहा है। इंसान ने प्रकृति का इतना दोहन कर दिया है कि इसका असर उत्तराखंड के उन इलाकों में भी देखने को मिल रहा है, जिनके बारे में कोई जानता तक नहीं था। केदारनाथ में हुई आपदा इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण भी है। अब खबर है कि बीती 16 जुलाई को बारिश के बाद गंगा के उद्गम स्थल गोमुख को खासा नुकसान हुआ है। भागीरथी नदी में भी मलबा जमा होने से धारा मूल जगह से 150 मीटर दाहिनी ओर खिसक गई है। इसके साथ ही गंगोत्री से गोमुख के बीच रास्ता कई जगहों पर टूटा हुआ है। पानी की वजह से तीन पुलिया बह चुकी हैं। पिछले दिनों गंगोत्री नेशनल पार्क की टीम गोमुख का निरीक्षण करने गई थी। ये टीम शनिवार को वापस लौट आई थी। टीम लीडरका कहना है कि तपोवन से निकलने वाली आकाश गंगा नदी में जबरदस्त उफान आया था।
बताया जा रहा है कि मलबा भागीरथी नदी के बीच में जमा है, इससे नदी का बहाव गोमुख के दाहिनी तरफ हो गया है। वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञनिकों का कहना है कि अभी तक ये साफ नहीं हो सका है कि ग्लेशियर के क्रेवास में कितना मलबा घुसा है। जल्द ही टीम इसका पता लगाएगी। शोध के बाद ही कुछ कहा जा सकेगा। इससे पहले हमने आपको एक बड़ी बात भी बताई थी। गोमुख ग्लेशियर में जो कुछ हो रहा है, वो सच में हैरान कर देने वाला है। बताया जा रहा है कि ग्लोबल वॉर्मिंग का असर इस ग्लेशियर पर दिखने लगा है। इस वजह से इस ग्लेशियर का एक हिस्सा टूट रहा है। आगे आने वाले वक्त में ये बड़ा खतरा भी बन सकता है। एक बार फिर से धरती मानव जाति को संदेश दे रही है कि खिलवाड़ बंद कीजिए। दरअसल गंगोत्री नेशनल पार्क के गेट खुलने के बाद गोमुख ग्लेशियर की ताजा रिपोर्ट सामने आई है। ये रिपोर्ट हर किसी के लिए हैरान कर देने वाली खबर से कम नहीं है।
इससे पहले हमने आपको बताया था कि ग्लेशियर की ताजा तस्वीरें देखने के बाद वैज्ञानिकों का दावा है कि ग्लेशियर के आगे का करीब 50 मीटर हिस्सा भागीरथी के मुहाने पर गिरा हुआ है। हालांकि, गोमुख में तापमान कम होने के कारण ये हिस्सा पिघलना शुरू नहीं हुआ है। पंडित गोविंद बल्लभ पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान के वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लेशियर के आगे का जो हिस्सा टूटकर गिरा है, उसमें 2014 से बदलाव नजर आ रहे हैं। वैज्ञानिक इसकी मुख्य वजह चतुरंगी और रक्तवर्ण ग्लेश्यिर का गोमुख ग्लेशियर पर बढ़ता दबाव मानते हैं। आपको बता दें कि पंडित गोविंद बल्लभ पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान की टीम साल 2000 से गोमुख ग्लेशियर पर रिसर्च कर रही है। वैज्ञानिकों के मुताबिक 28 किलोमीटर लंबा और दो से चार किलोमीटर चौड़ा गोमुख ग्लेशियर तीन और ग्लेशियरों से घिरा है।