पीएम मोदी की ‘दृढ़ता’ से हारा चीन, डोकलाम में मनोवैज्ञानिक बढ़त भारत के पास !
Aug 2 2017 8:52PM, Writer:Shantanu
चीन की विस्तारवादी नीति से उसके कई पड़ोसी देश परेशान हैं। ये पूरी दुनिया जानती है कि किस तरह से चीन अपने पड़ोसी देशों पर कब्जा करने की नीति से आगे बढ़ रहा है। भारत के साथ भी वो यही चाल अपना रहा है। भारत और चीन के बीच डोकलाम विवाद खत्म नहीं हो रहा है। इसके कारण दोनों देशों के बीच संबंधों में भी कड़वाहट देखने को मिल रही है। हाल ही में चीनी सेना के 90 साल पूरे होने के मौके पर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने एक बार फिर से जंग की धमकी दी थी। उन्होंने सेना की वर्दी पहनकर कहा था कि जंग के लिए तैयार रहो। चीनी सेना ने शक्ति प्रदर्शन भी किया। मिसाइलों, टैक्स और आधुनिक हथियार दिखाए। लेकिन सवाल ये है कि क्या चीन ये सब कुछ इसलिए कह रहा है क्योंकि वो डोकलाम विवाद पर भारत का कुछ नहीं कर सकता है। ये चीन की खिसियाहट है।
बता दें कि चीन की ये रणनीति रही है कि वो दबाव बनाकर पड़ोसी देशों को डरा के रखता है। वहां पर धीरे धीरे अपना कब्जा बढ़ाने लगता है। पाकिस्तान में चीन जो कर रहा है वो इसी की मिसाल है। आज की तारीख में पाकिस्तान चीन का गुलाम बन गया है। लेकिन भारत ने इस बार चीन को उसी के हथियार से मात देने की रणनीति तैयार की है। चीन भारत से कह रहा है कि वो अपनी फौज को डोकलाम से हटाए। वहीं भारतीय फौज पीछे हटने को तैयैर नहीं है। पीएम मोदी के अटल रुख के कारण चीन परेशान हो रहा है। चीनी मीडिया लगातार जंग की धमकी दे रहा है। पीएम मोदी की तरफ से अभी तक डोकलाम को लेकर कोई बयान नहीं आया है। यानि मनोवैज्ञानिक जंग वो जीत रहे हैं। भारत की तरफ से इस तरह की प्रतिक्रिया की उम्मीद चीन ने नहीं की थी।
इसी के साथ आपको बता दें कि चीन की परेशानी का दूसरा कारण ये है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय डोकलाम विवाद में भारत के पक्ष में खड़ा दिखाई दे रहा है। चीन को इस बात की जरा भी उम्मीद नहीं थी कि भारत डोकलाम में इस तरह से अटल हो जाएगा। भारत को डराने की चीन की सारी कोशिशें बेकार हो गई हैं। चीन अपनी संप्रुभता की बात करता है। लेकिन भूटान की संप्रभुता का उसे कोई ख्याल नहीं है। धमकी, प्रोपेगैंडा फेल होने के बाद चीनी राष्ट्रपति को खुद सामने आकर बान देना पड़ा है। हाल ही में भारतीय एनएसए अजीत डोभाल चीन की यात्रा पर गए थे। वहां पर उन्होंने शी जिनपिंग से मुलाकात की। ये भारत के अडिग होने का नतीजा है कि चीनी राष्ट्रपति को अजीत डोभाल से मुलाकात करनी पड़ी। डोभाल की चीन यात्रा के बाद से माहौल थोड़ा बदला है। चीन के रुख में बदलाव आया है।