उत्तराखंड का ‘शेर’, 24 आंतकियों को उतारा मौत के घाट, सलाम कीजिए इस कर्नल को
Aug 15 2017 4:27PM, Writer:अजय
ये वही कर्नल हैं, जो दिसंबर 2001 से 2003 के बीच जम्मू-कश्मीर में तैनात थे। जम्मू-कश्मीर के शोपियां सेक्टर में इनकी तैनाती थी। अपने 6 साथियों के साथ इन्होंने 24 आतंकियों को मौत की नींद सुला दिया था। इस जबरदस्त लड़ाई में इन्हें दो गोलियां लगीं। एक गोली आज भी इनके जिस्म में मौजूद है। ये वो जख्म है, जो बार बार इन्हें उस मुठभेड़ की याद दिलाता है। 2001 से 2003 के बीच, ये वो दौर था जब कश्मीर घाटी में आतंकवाद फैला था। हिज्बुल मुजाहिद्दीन और लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठन यहां पनप चुके थे। इस वजह से घाटी के पीर पंजाल क्षेत्र और शोपियां के गांवों को 'ब्लैक विलेज' कहा जाता था। इस दौरान 4 गढ़वाल राइफल की तैनाती शोपियां में हुई। इसी इलाके के सिदाऊ नामक जगह पर सेना के मेजर अजय कोठियाल ने एक नई ऑपरेशन पोस्ट बनाई थी। इस ऑपरेशन पोस्ट से आतंकियों के खिलाफ मोर्चा खोला गया था।
मेजर कोठियाल आज कर्नल हैं। इस वक्त मेजर कोठियाल ने एक बड़ी रणनीति तैयार की थी। इस प्लान के तहत उन्होंने आतंकवादियों का वेश धरा और अपनी टीम के साथ पीर पंजाल रेंज में घूमने लगे। इसके साथ ही आतंकियों की तलाश शुरू हो गई। आतंकियों को पता ही नहीं था कि गढ़वाल राइफल का एक मेजर उनके लिए काल बनकर इलाके में घूम रहा है। मेजर कोठियाल ने वहां गुर्जरों, गडरियों और स्थानीय लोगों से घनिष्ठता बढ़ानी शुरू की। धीरे धीरे आतंकवादियों के बारे में पुख्ता जानकारी लेना शुरू कर दिया। इसके बाद शुरू हुआ था सेना का सबसे बड़ा ऑपेरशन। जुलाई 2002 में आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन 'नस्नूर' शुरू किया गया था। पहले मेजर कोठियाल की टीम ने सीमा पार से आए दो आतंकियों को मार गिराया। यूं समझिए कि घाटी से आतंकियों के सफाए का आगाज हो गया था। मेजर कोठियाल की टीम दिन-रात पहाड़ों और जंगलों में घूमती रही।
इस दौरान ऑपरेशन 'सतारी' भी चलाया गया। ऑपरेशन के दौरान मेजर को दो बार गोली लगी लेकिन हिम्मत नहीं डगमगाई। इसके बाद शुरू किया गया था ऑपरेशन 'कौंग वतन' । ये वो ऑपरेशन था, जिसकी केस स्टडी आज भी इंडियन आर्मी के बैटल स्कूलों में सिखाई जाती है। नए बच्चे इस ऑपरेशन को देखते हैं और इसके बारे में पढ़ते हैं। मेजर कोठियाल की टीम ने एक साथ पाकिस्तान से आए 7 आतंकवादियों को मार गिराया। आपको जानकर हैरानी होगी कि 7 आतंकियों खात्मे के लिए सिर्फ 16 गोलियां चली थी। देश की सेना में ये अपनी तरह का पहला ऑपरेशन था। मेजर अजय कोठियाल, जो पहले ही 'शौर्य चक्र' से नवाजा जा चुका था। लेकिन इसके बाद असाधारण वीरता और लीडरशिप के लिए उन्हें राष्ट्रपति ने 'कीर्ति चक्र' से सम्मानित किया था। आज उत्तराखंड के इस लाल की गिनती इंडियन आर्मी के उन अधिकारियों में होती है, जिन्हें सबसे ज्यादा मेडल मिले हैं।