उत्तराखंड की इस महिला को सलाम, एक हुंकार से खत्म की तीन तलाक की कुप्रथा !
Aug 22 2017 2:09PM, Writer:प्रगति
तीन तलाक के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने जैसे ही अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया तो शायरा बानो की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। ये वो ही महिला हैं, जिन्होंने इस मुद्दे को लेकर लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। आखिरकार इस महिला ने जीत हासिल की। शायरा बानो इस मामले में मुख्य याचिकाकर्ता हैं। शायरा बानो उत्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली हैं। उनकी शादी 2001 में हुई थी। 10 अक्टूबर 2015 को उनके पति ने उन्हें तलाक दे दिया था। शायरा ने कोर्ट में अर्जी दी थी। इस अर्जी में शायरा ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के तहत हर किसी को समानता का अधिकार है। लेकिन तीन तलाक मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद शायरा बानो के चेहरे पर खुशी देखते ही बनती है। देश की न्यायपालिका में सबसे बड़े अधिकारों में से एक अधिकार है समानता का अधिकार। ये वो अधिकार है जिस पर हर किसी का हर है।
लेकिन मुस्लिम महिलाओं के लिए ये हक कही गुम हो गया था। एक आवाज उठी तो देशभर में बवाल मच गया। जी हां हम बात कर रहे हैं तीन तलाक की। एक ऐसी प्रथा जिससे हर मुस्लिम महिला छुटकारा पाना चाहती थी। लेकिन देश की राजनीति में इस मुद्दे को इस तरह उछाला गया था कि मुस्लिम महिलाओं का जीना दुश्वार हो गया था। आखिर वो वक्त आ ही गया जब सुप्रीम कोर्ट ने इस विवादित मुद्दे पर अपना आखिरी फैसला सुना दिया। देश की सबसे बड़ी अदालत ने ट्रिपल तलाक को असंवैधानिक करार दिया है। याचिकाकर्ता शायरा बानो के वकील ने कहा कि अनुच्छेद 25 में धार्मिक प्रैक्टिस की बात है। उन्होंने कहा कि धार्मिक दर्शनशास्त्र में तीन तलाक को पाप कहा गया है। ऐसे में इस प्रथा को धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के तहत संरक्षित क्यों किया जाए।उत्तराखंड के काशीपुर की शायरा ने 2016 में सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दायर की थी।
उन्होंने ट्रिपल तलाक और हलाला के चलन को चुनौती दी थी। उन्होंने मुस्लिमों में बहुविवाह प्रथा को भी चुनौती दी। शायरा ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत महिलाओं के साथ ऐसे भेदभाव के मुद्दे पर विचार करने को कहा था। शायरा ने अर्जी में कहा था कि तीन तलाक संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। शायरा ने जैसे ही ये याचिका दाखिल की तो देशभर से मुस्लिम महिलाओं को उनका समर्थन मिला था। एक के बाद एक कई और याचिकाएं दायर की गईं। एक मामले में सुप्रीम कोर्ट की डबल बेंच ने भी खुद संज्ञान लिया और चीफ जस्टिस से कहा था कि वो स्पेशल बेंच का गठन करें। इससे मुस्लिम महिलाओं के मामलों को देखा जा सके। अब इस कुप्रथा को असंवैधानिक करार दिया गया है। शायरा बानो का कहना है कि ये न सिर्फ मेरे लिए बल्कि मुस्लिम महिलाओ के लिए ऐतिहासिक दिन है। ये सुधार की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। यह इतना बड़ा दिन है, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।