उत्तराखंड की ‘आयरन लेडी’ प्रभा देवी सेमवाल, जिसने पहाड़ों को दी नई जान
Sep 10 2017 1:34PM, Writer:मीत
हिमालय जितने ही अडिग हैं यहां के निवासी, जो हिमालयी सभ्यता के साथ आज भी खुद हिमालय का हिमायती बनकर रचे बसे हैं। और आज हम आपको इस महिला शक्ति के बारे में बता रहे हैं, जिसने अपने अडिग हौसलों से साबित किया है कि पहाड़ की महिलाएं भी हिमालय जैसी शक्ति से कम नहीं। केदारघाटी बसे पसालत गाँव की प्रभा देवी सेमवाल हिमालय की उन अडिग हस्तियों का प्रतिनिधत्व करती है जो हिमालय को बचाने, उसे खूबसूरत बनाने और उसकी आभा को अविरल बनाने में जुटी है। 65 वर्ष की इस माँ का अपना जंगल है, जिन्होंने उसे खुद उगाया, पाला पोसा और सहेजा है। आज उनके द्वारा उगाये गए जंगल में पेड़ो की संख्या 500 से अधिक है। इमारती लकडियो से लेकर जानवरों को घास में देने वाले पेड़ों, रीठा, बाँझ, बुरांस, दालचीनी आदि सभी स्थानीय पेड़ो को लगाया गया है।
बहुत पहले जब ग्राम पंचायत के जंगल में अवैध कटाई और भूस्खलन से जंगल से रोजमर्रा की जिंदगी को मिलने वाले संसाधनो में कठिनाई आने लगी तो प्रभा देवी ने अपने कुछ खेतो के समूह में जंगल उगाना शुरू कर दिया. जहां उन्होंने पहले अपने जानवरो के लिए घास उगाई और फिर धीरे धीरे पेड़ो को उगाकर आज एक जंगल ही उगा दिया। आज उनके द्वारा उगाये गए जंगल में पेड़ो की संख्या 500 से अधिक है। प्रभा देवी कहती हैं कि “बचपन से वो लकड़ी और घास के लिए जाती रही है पर जीवन में कभी उन्होंने किसी छोटे पेड़ को जड़ से नहीं काटा”. उनका कहना है कि उनके द्वारा लगाये गए ज्यादातर पेड़ उग जाते है चाहे वो किसी भी परस्थिति में लगाये गए हो। आज उनके बेटे बेटिया देश विदेश में अपने कामो में लगे हैं पर उन्होंने कभी पहाड़ नहीं छोड़ा न देश विदेश में रह रहे अपने बेटे बेटियो के यहाँ गए।
65 साल की उम्र में आज भी उनकी दिनचर्या अपने खेत, जानवरो और पेड़ो के ही इर्द गिर्द घूमती है। महिलाएं आज भी पहाड़ की जीवन रेखाएं है या यूँ कहिये की यहाँ की आर्थिकी उसी के इर्द गिर्द घुमती है, आज भी उसके सामने पहाड़ जैसी चुनौतियों का अम्बार लगा हुआ है जिसका वो बरसों से डटकर मुकबला कर रही है। प्रभा देवी सेमवाल भी ऐसी ही एक महिला जिसके अथक प्रयासों ने बंजर भूमि को हरियाली में तब्दील कर हरा भरा जंगल खड़ा कर दिया। उत्तराखंड के लोगों का जल, जंगल और पर्यावरण से अटूट प्रेम सदियों से रहा है, यहाँ के आम लोगो की जिंदगी से जुड़े अधिकतर कार्य जंगलो से ही जुड़े हुए होते है। जंगल यहाँ की आवश्यकता भी है और रोजमर्रा के जीवन से जुडी एक प्रयोगशाला भी। पहाड़ी लोगो का प्रकृति प्रेम किसी से छुपा नहीं है, वो चाहे चिपको आंदोलन या मैती आंदोलन। हिमालय के इन सभी जीवट लोगो को हमारा का सलाम।