image: Story of manish rawat the olympion

देवभूमि के गांव का लड़का, कभी होटल में वेटर था, अब टोक्यो ओलंपिक में जीतेगा मेडल !

Sep 20 2017 12:26PM, Writer:सुरेश

एक मिल्खा सिंह वो थे, जिन्होंने मुफलिसी और गरीबी से निकलकर अपनी जिंदगी को एक नए मकाम पर पहंचाया। एक देवभूमि का ये लड़का भी है, जो भी गरीबी का वार झेल चुका है, जो होटल में वेटर की नौकरी कर चुका है, जो यात्रियों को घुमाने के लिए गाइड का काम कर चुका है। लेकिन उसने हार नहीं मानी। हार ना मानने का ये फलसफा लगातार आगे बढ़ता गया और आज इस लड़के को एक बार फिर से बड़ी जिम्मेदारी दी गई है। हम बात मनीष रावत की कर रहे हैं। वो मनीष रावत, जो इससे पहले रियो ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। लेकिन उस वक्त वो अपने लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाया था। लेकिन अब एक बार फिर से वक्त आ गया है खुद को साबित करने का। भारत सरकार ने 152 खिलाड़ियों की लिस्ट तैयार की है। इस लिस्ट में मनीष रावत का नाम भी है।

इस बार मनीष के हौसलों को कोई नहीं रोक सकता। आगे बढ़ना है और हर हाल में जीत हासिल करनी है। मनीष की कहानी जानकर आप बार बार ये सोचेंगे कि जब एक वेटर का काम करने वाला लड़का इस बड़े मुकाम पर पहंच सकता है, तो फिर वो लोग क्यों नहीं जो हाथ पर हाथ धरकर दूसरे को कोसने का ही काम करते हैं। बदरीनाथ के एक होटल में मनीष रावत वेटर का काम करते थे। इसके साथ साथ परिवार का पेट पालने के लिए दूध बेचने का भी काम करते थे। राजकीय इंटर कॉलेज बैरागना में पढ़ाई की। ये स्कूल घर से 7 किलोमीटर दूर था। यानी एक दिन में 14 किलोमीटर का सफर तो ऐसे ही हो जाता था। 2002 में पिता की मौत हुई तो पूरे परिवार की जिम्मेदारी इनके ऊपर आ गई। खेतीबाड़ी के साथ-साथ हर वो काम किया, जिससे कुछ पैसे मिल जाएं।

2006 में बदरीनाथ के एक होटल में वेटर का काम किया। दूध बेचा और यात्रियों के साथ गाइड बनकर रुद्रनाथ गया। इस दौरान उनकी मुलाकात कोच अनूप बिष्ट से हुई, जो गोपेश्वर स्टेडियम में कोच थे। उनके कहने पर ही मनीष ने पढ़ाई के लिए गोपेश्वर में एडमिशन ले लिया। यहीं से शुरू होेता है मनीष का चमचमाता करियर। 2011 में उन्हें पुलिस में खेल कोटे में जॉब मिली। 2012 ऑल इंडिया पुलिस चैंपियनशिप में उन्हें कांस्य पदक मिला। अब मनीष का सपना है कि वो देश के लिए ओलंपिक मेडल जीतें। आप भी उन्हें बधाई दीजिए। इस बार जितना हो सके मनीष का हौसला अफजाई कीजिए। उम्मीद है कि इस बार देवभूमि का ये लाल कामयाबी की नई कहानी गढ़ेगा और दुनिया को देखा देगा कि पहाड़ के नौजवानों में कैसा दमखम होता है।


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