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उत्तराखंड को पीएम मोदी का बड़ा तोहफा, 60 गांवों से शुरू होगी ऐतिहासिक पहल !

Sep 25 2017 4:05PM, Writer:कपिल

देश के पीएम मोदी एक बार फिर से उत्तराखंड के लिए बड़ा तोहफा लेकर आए हैं। केंद्र सरकार लगातार उत्तराखंड में रोजगार बबढ़ाने और पलायन रोकन के तरीकों पर विचार कर रही थी। आखिरकार अब उत्तराखंड के सुदूर गांवों तक विज्ञान की क्रांति पहुंचाने कि लिए केंद्र सरकार के द्वारा एक बड़ी पहल की गई है। इसका मकसद ये है कि गांवों तक टेक्नोलॉजी को पहुंचाना और तकनीक के बल पर हर गांव को आत्मनिर्भर बनाना। केंद्र सकरा का मानना है कि इससे गांवों में पलायन रुकेगा और गांवों से दूर होती खुशहाली वापस लौटेगी। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन सिंह ने अपनी योजना में उत्तराखंड पर ही फोकस किया है। इसके लिए पंडित दीन दयाल उपाध्याय विज्ञान ग्राम संकुल परियोजना शुरू की गई है। इस परियोजना को लॉन्च करते हुए केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन सिंह ने मीडिया से बात की है।

उन्होंने कहा कि पहले फेज में इसे पायलट प्रोजेक्ट के रूप में गांव के चार समूहों के रूप में शुरू किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद को इस योजना को जलाने की जिम्मेदारी दी जा रही है। इसके अलावा ग्रामोद्योग नेटवर्क, सुरभि फाउंडेशन और उत्तराखंड उत्थान परिषद समेत कई संगठन भी इस दिशा में काम करेंगे। शुरुआत में गढ़वाल और कुमाऊं से चार समूहों में 60 गांवों का सलेक्शन किया गया है। केंद्र सरकार की योजना है कि इन गांवों की करीब एक लाख की आबादी को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाभ दिया जाएगा। इन गांवों में क्या क्या परेशानियां हैं और किन प्रयासों से रोजगार मिल सकता है, इसके लिए विशेषज्ञ स्थानीय लोगों से पूछकर ही जानकारियां जुटाएंगे। इसके साथ ही स्थानीय संसाधनों के आधार पर इन समस्याओं के निराकरण का प्रयास होगा।

यानी आत्मनिर्भरता का एक मॉडल तैयार किया होगा। अगर उत्तराखंड में ये फॉर्मूला लागू हो जाता है तो इसके बाद ही देश के बाकी पर्वतीय राज्यों में भी इसे लागू कर दिया जाएगा। अब आपको बताते हैं कि इस परियोजना में फोकस किस किस पर किया गया है। शहद, दुग्ध उत्पादन, हर्बल चाय, मशरूम, हॉर्टिकल्चर, वनोपज, ट्रेडिशनल क्राफ्ट, औषधीय और सुगंधित फूल या पेड़, हैंडलूम और बाकी स्थानीय उत्पादों पर फोकस किया जाएगा। इस परियोजना के लिए 6.3 करोड़ रुपये की वित्तीय मदद का ऐलान किया जा चुका है। ये राशि तीन सालों के लिए स्वीकृत की गई है। इन गांवों को इतना सक्षम बनाया जाएगा कि एक साल के भीतर ही 20 लाख रुपये तक की आय होने लगेगी। इसके बाद जब ये गांव एक करोड़ रुपये तक जुटा लेंगे तो उन्हें आत्मनिर्भर माना जाएगा और इन पर से नियंत्रण हटा लिया जाएगा।


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