पहाड़ के फौजी दादा का दम देखिए, गांव में बैठकर ही पैदा कर दिया रोजगार
Oct 24 2017 9:03PM, Writer:कपिल
उत्तराखंड में इस वक्त पलायन को लेकर कई बातें कही जा रही हैं। पलायन से गांव खाली हो रहे हैं। केंद्र सरकार पलायन रोकने की बात कर रही हैं। ऐसे में पहाड़ों के एक गांव के रिटायर्ड फोजी ने रोजगार की नई राह युवाओं को दिखा दी है, वो भी गांव में बैठकर। इस पूर्व फौजी ने नीती घाटी में सेब का उत्पादन किया। इसके साथ ही लोगों में घर बैठे ही रोजगार की सैकड़ों उम्मीदें जगा दी। बिक्री के लिए राज्य में सही व्यवस्था ना होने की वजह से फौजी दादा अपने संसाधनों से ही सेब को बाहरी राज्यों में भेज रहे हैं। चमोली जिले के रिटायर्ड फौजी इंद्र सिंह बिष्ट आज युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हो गए हैं। जाहिर सी बात है कि अगर कोई पलायन रोक कर दिखा दे तो ये अपने आप में बड़ी बात है। खास तौर पर चमोली जिला भारत तिब्बत चीन सीमा से लगा हुआ है जिला। सीमावर्ती गांवों के लोगों को द्वितीय रक्षा पंक्ति के रूप में भी कहा जाता है।
दूसरा मुल्क अगर कोई भी हरकत करे तो सरकार को भी सीमावर्ती गांवों के लोगों से ही पता चलता है। दुख की बात ये है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में पलायन बढ़ रहा है। गांव खाली होते जा रहे हैं। रोजगार की तलाश में लोग मैदानी इलाकों की ओर जा रहे हैं। ऐसे वक्त में चमोली के जेलम गांव के पूर्व फौजी इंद्र सिंह बिष्ट ने ऐतिहासिक काम कर दिखाया है। सेब का उत्पादन कर स्थानीय स्तर पर ही रोजगार की आस जगा दी है। इसके साथ ही पलायन को रोकने के लिए लोगों को प्रेरित किया है। इंद्र सिंह बिष्ट अस्सी के दशक में सेना से रिटायर हुए थे। रिटायर होने के बाद भी उन्हें पूर्व फौजी कोटे से नौकरी मिल रही थी। लेकिन इंद्र सिंह बिष्ट ने नौकरी के बजाए घर पर ही रोजगार पैदा करने की कसम खा ली। 1983 में इंद्र सिंह बिष्ट हिमाचल गए थे। वहां सेब के बागान देखकर उन्होंने अपने गांव में ही सेब का बड़े लेवल पर उत्पादन करने की ठानी।
हिमाचल से वो घर लौटे तो गांव में सेब की पौध लगाई। धीरे धीरे उन्होंने 50 नाली भूमि पर सेब के पौधों का रोपण किया। 1990 में इंद्र सिंह बिष्ट की मेहनत रंग लाई। सेब की पौध से सेब की पैदावार भी शुरू हुई। उन्होंने इस सेब को पहले स्थानीय बाजार में बेचा। जैसे जैसे पैसे जुटे तो अपने संसाधनों से इस सेब को देहरादून, सहारनपुर, दिल्ली की मंडियों तक पहुंचाया। आज इंद्र सिंह बिष्ट हर साल अकेले ही करीब 100 कुंतल सेब का उत्पादन करते हैं। इससे वो हर साल आठ से दस लाख तक कमाते हैं। अब फौजी दादा अपने गांव की जमीन पर नासपाती और काला जीरा भी उगा रहे हैं। सेब के साथ नासपाती भी बाजार तक पहुंचाई जाती है। काला जीरा की कीमत बाजार में एक हजार रुपए प्रति किलो है। फौजी दादा के बगीचे में आपको डेलीसस, रॉयल डेलीसस, गोल्डन डेलीसस, रायमर जैसी प्रजातियों के सेब मिलेंगे।