image: kamalvyuha in garhwali at dehradun

देहरादून के परेड ग्राउंड में पहली बार, गढ़वालियों के लिए गौरवशाली पल

Oct 28 2017 11:43AM, Writer:प्रियंका

एक कलाकार जो ना जाने कितने सालों से गढ़वाल की संस्कृति और सभ्यता के सबसे कीमती खजाने को संजोए हुए है। उस कलाकार के पास गढ़वाल की संस्कृति की वो विधा है, जो कभी पांडव उत्तराखंड को सौंप गए थे। हम बात कर रहे हैं आचार्य कृष्णानंद नौटियाल की, जो कि बतौर प्रधानाचार्य उत्तराखंड के पहाड़ों में अपना कर्तव्य निभा रहे हैं। इन्होंने दिल्ली के इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स के अलावा देशभर की कई जगहों में चक्रव्यूह और कमलव्यूह का मंचन किया है और वो भी गढ़वाली भाषा में। इनका मानना है कि गढ़वाल की भाषा पर हर किसी को गर्व होना चाहिए। इससे पहले आचार्य जी ने 25 फरवरी 1995 देहरादून के ही परेड ग्राउंड में चक्रव्यूह का भव्य मंचन किया गया था। उस वक्त उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों की याद में ये मंचन किया गया था।

अब वक्त आ गया है कि कमलव्यूह को भी गढ़वाली भाषा में लोगों के सामने पेश किया जाए। हर उत्तराखंडी के लिए वो गौरवशाली पल होगा, जब 29 अक्टूबर को लोग गढ़वाली में पांडवकालीन युद्धकला को अपनी आंखों के सामने देखेंगे। ऐसा शायद आपने सिर्फ महाभारत सीरियल में ही देखा होगा। आखिर वो कौन सी विधा है, जिसके बूते चक्रव्यूह को तैयार किया जाता है ? वो कौन सी विधा है, जिसके जरिए कमलव्यूह को तैयार किया जाता है ? कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध के बाद पांडवों ने अपने विध्वंसक हथियार उत्तराखंड के लोगों को सौंप दिए थे। उत्तराखंड के स्वर्गारोहिणी से ही पांडव स्वर्ग की यात्रा पर निकले थे। इसके साथ ही कहा जाता है कि पांडव वो कला भी देवभूमि के लोगों को सौंप गए, जो महाभारत में इस्तेमाल की गई थी। आज भी केदारघाटी में पांडवों के अस्त्रों की पूजा होती है और उन्हें ग्राम देवता कहा जाता है।

जो कलाएं पाडंव उत्तराखंड को सौंप गए, इन्हीं कलाओं में से एक महाभारत कालीन युद्ध कला है कमलव्यूह। इसके पीछे एक सत्यकथा है। चक्रव्यूह में कौरवों ने छल से अभिमन्यु का वध किया था, इसके बाद जयद्रथ ने अभिमन्यु की गर्दन पर लात मारी थी। इस बात की जानकारी अर्जुन को लगी तो उन्होंने शपथ ली कि वो अगले दिन जयद्रथ को मौत की नींद सुला देंगे, वरना खुद ही चिता पर बैठ जाएंगे। कौरवों को आचार्य द्रोण का साथ मिला था। आचार्य द्रोण ने ही चक्रव्यूह की रचना की थी। इसके बाद उन्होंने कहा कि वो एक और ऐसा व्यूह बनाएंगे कि अर्जुन भी जयद्रथ का कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे। अगले दिन के लिए कमलव्यूह तैयार किया गया। चक्रव्यूह में 7 द्वार थे तो कमलव्यूह में 14 द्वार थे।

अगला दिन होता है तो अर्जुन के सामने कमलव्यूह था। इस व्यूह के बीच में जयद्रथ को रखा गया था। अर्जुन ने शपथ ली थी कि शाम होने से पहले ही जयद्रथ का अंत कर देंगे। लेकिन सूरज ढलने से कुछ वक्त पहले तक अर्जुन 14 में से 7 द्वार ही पार कर पाते हैं। ऐसे में वो अपने सारथी भगवान कृष्ण से कहते हैं कि उन्हें हार नजर आ रही है। प्रभु कृष्ण योग विद्या में निपुण थे। वो योगमाया को बुलाते हैं और आसमान में बादल छा जाते हैं। कौरवों को लगता है कि शाम ढल गई और अब अर्जुन को चिता पर जलना होगा। उधर जयद्रथ भी अर्जुन की चिता के सामने नाचने लगते हैं। एक बार फिर से भगवान कृष्ण योगमाया का आह्वान करते हैं तो धूप निकल आती है। बस फिर क्या था, कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि क्षत्रिय धर्म का पालन करें। इस तरह से जयद्रथ का वध होता है।


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