देवभूमि का मान-सम्मान ऐसे ही बनाए रखना, भ्रष्टतंत्र का दुश्मन बना ये ‘सिंघम’
Oct 31 2017 11:50AM, Writer:जयंती
उसकी राह में सिस्टम ऐसे-ऐसे व्यवधान पैदा करता है कि ईमानदारी कहीं छिपकर पनाह ढूंढने लगती है। लेकिन ये भी सत्य है कि यदि अधिकारी भ्रष्टतंत्र का हिस्सा न बनने की ठान ले तो वो राजनेताओं की चूलें हिलाने का माद्दा रखता है, पर इसके लिए साहस की दरकार है। जो ऐसा साहस दिखाने का गुर्दा रखेगा, वही इस भष्टतंत्र की जड़े खोखली कर पाएगा, ताकि आने वाली पीढ़ी एक ईमानदार माहौल में सांस ले सके। सत्ता और शक्ति जब हाथ में हो तो नियम-कानूनों को अपने स्वार्थ के हिसाब से तोड़ना मरोड़ना मुश्किल नहीं। ऐसे में नेता, मंत्री अपने रसूख का उपयोग कर न केवल कार्यपालिका, न्यायपालिका को अपने तरीके से हांकते हैं, बल्कि अधिकारियों को भी भ्रष्ट सिस्टम में इस कदर उलझा देते हैं कि ईमानदार अधिकारी के लिए कार्य करना नामुमकिन साबित हो जाता है।
नतीजतन सिस्टम को सुधारने का जज्बा लिए सरकारी सेवा में आए युवा समय बीतते-बीतते इस भ्रष्ट सिस्टम का हिस्सा बन जाते हैं। और जो हिस्सा नहीं बन पाते, उन्हें तबादलों और झूठी जांचों के भंवर में इस कदर उलझा दिया जाता है कि उनका अस्तित्व ही खो जाता है।इन दिनों रुद्रप्रयाग के युवा जिलाधिकारी मंगेश घिल्डियाल अपने बेहतर कार्यों के लिए चर्चा पा रहे हैं। पुरानी बनी बनाई लीक से हटकर वे जिस प्रकार कार्य कर रहे हैं, उसका न केवल स्थानीय जनता स्वागत कर रही है, बल्कि मीडिया में भी उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा हो रही है। चाहे वो विद्यालयों या सरकारी कार्यालयों का औचक निरीक्षण हो या अनियमितता पाने पर खुद आगे बढ़कर समस्या का निस्तारण करना हो। एक विद्यालय में विज्ञान वर्ग के अध्यापक की कमी थी।
इसे देखते हुए उन्होंने अपनी पत्नी को ही वहां अध्यापक की व्यवस्था होने तक पढ़ाने का जिम्मा सौंप दिया, जिसे उन्होंने सहजता से स्वीकार कर लिया। नगरपालिका क्षेत्र में रात्रि चैपाल लगाकर भी उन्होंने नई पहल की। अमूमन देखा जाता है कि अधिकारी सिर्फ उतना ही कार्य करता है, जो उसके कार्यक्षेत्र में हो या जो उसे करने को कहा गया हो, किंतु मंगेश यहां भी लीक तोड़ते नजर आते हैं। वे रात्रि चैपाल में जनता की अन्य समस्याएं भी ध्यान से सुनते हैं और उन्हें निस्तारित करने का हरसंभव प्रयास करते हैं। यही वजह है कि क्षेत्रीय जनता निःसंकोच अपनी समस्या लेकर उनके पास आ-जा सकती है। मंगेश अभी नए हैं। लिहाजा सिस्टम बदल देने का माद्दा रखने का जोश होना कोई नई बात नहीं है, किंतु लीक से परे अपनी नई लकीर खींचने का जो दम वे दिखा रहे हैं।
उससे उम्मीद की जानी चाहिए कि आगे भी ये जज्बा कायम रहे, वर्ना संजीव चतुर्वेदी, श्रीधर बाबू अद्दांकी, सचिन कुर्वे जैसे कितने उदाहरण हैं, जो अपने कार्यों से जनता में उम्मीद की किरण तो फूंक गए, लेकिन सिस्टम ने उनको चमकविहीन कर दिया। दूसरी ओर सरकार के चहेते अधिकारी रिटायरमेंट के बाद भी सरकार की आंखों का तारा बन राज्य को लूटे जा रहे हैं। हर वर्ष सिविल सेवा में मैरिट में आने वाले युवाओं के प्रेरणादायक साक्षात्कार हर चैनल में प्रसारित होते रहते हैं, जिसमें ये युवा सिस्टम को बदल देने का, देश की सेवा करने के लिए सिविल सेवा का विकल्प चुनने का दंभ भरते नजर आते हैं, परंतु यदि सभी इस जज्बे पर कायम रह पाएं तो यह देश दुनिया में एक नजीर बन चुका होता।