image: Pandav nritya of uttarakhand

Video: सिर्फ उत्तराखंड में ही क्यों होता है पांडव नृत्य ? देवभूमि की अतुल्य संस्कृति से जुड़िए

Nov 2 2017 6:50PM, Writer:उर्वशी

उत्तराखंड यानी देवों की धरा। कहा जाता है कि पग पग पर आपको यहां देवों से संबंधित प्रमाण मिलेंगे। देवभूमि को पांडवों की धरती भी कहा जाता है। ये बात आप सब जानते हैं कि यहीं से स्वार्गारोहणी के लिए पांडवों ने प्रस्थान किया था। उत्तराखंड में पांडवों के पूजन की खास परंपरा है। इतिहासकार और पांडव नृत्य की परंपरा को लोगों तक पहुंचाने का काम कर रहे आचार्य कृष्णानंद नौटियाल कहते हैं कि महाभारत के युद्ध के बाद पांडवों ने अपने विध्वंसकारी अस्त्र और शस्त्रों को त्याग दिया था। इसके बाद उन्होंने सोचा कि आखिर किन्हें इन अस्त्र और शस्त्रों को सौंपा जाए। इसके लिए पांडवों को देवभूमि से बड़ा कोई स्थान नहीं मिला था। उत्तराखंड के लोगों को ही पांडवों ने अपने शस्त्र सौंप दिए थे और इसके बाद स्वार्गारोहिणी के लिए निकल पड़े थे। आज भी उत्तराखंड के हजारों गांव ऐसे हैं, जहां पांडवों को ग्राम देवता कहा जाता है।

पंडो नृत्य उत्तराखंड की केदारघाटी में होता है। इतिहासकारों के मुताबिक पांडव अलकनंदा और मंदाकिनी नदी किनारे से होते हुए स्वर्गारोहणी तक गए। जहां-जहां से पांडव गुजरे, उन स्थानों पर पांडव लीला आयोजित होती है। इसकी एक और खास बात ये है कि हर साल नवंबर से लेकर फरवरी महीने के बीच में ही केदारघाटी में पांडव नृत्य का आयोजन होता है। खरीफ की फसल कटने के बाद एकादशी और इसके बाद इसका आयोजन किया जाता है। पांडव नृत्यों के आयोजन में पांडव आवेश में आकर वाद्य यंत्रों की थाप और धुनों पर नृत्य करते हैं। पांडवों की याद में उत्तराखंड में चक्रव्यूह, कमलव्यूह और गरुण व्यूह का आयोजन होता है। कहा जाता है कि ऐसे मुश्किल व्यूहों की रचना के बारे में पांडवों ने सिर्फ केदारघाटी के लोगों को ही जानकारी दी थी। पांडव अपने अस्त्र-शस्त्र पहाड़ में छोड़कर मोक्ष के लिए स्वर्गारोहणी की ओर चले गए थे।

जिन स्थानों पर ये अस्त्र छोड़ गए थे, उन स्थानों पर विशेष तौर से पांडव नृत्य का आयोजन किया जाता है। आपने देखा भी होगा कि इन्हीं अस्त्र-शस्त्रों के साथ पांडव नृत्य करते हैं। ये भी मान्यता है कि हिंदुओं के प्रमुख तीर्थ जैसे बद्रीनाथ, बुढ़ाकेदार, केदारनाथ , तुंगनाथ, मध्यमेश्वर, रूद्रनाथ और कल्पेश्वर जैसे मंदिरो का निर्माण भी पांडवों ने ही किया था। इन सबके बीच सबसे आकर्षक चक्रव्यूह और कमलव्यूह का मंचन होता है। सिर्फ उत्तराखंड के लोगों के पास ही ये विधाएं हैं। हमारा उद्देश्य आपको ये बताना है कि उत्तराखंड का इतिहास कितना गौरवशाली रहा है। इसे आत्मसात करने जरूरत है।


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