उत्तराखंड के ‘अन्ना हजारे’, इस पूर्व फौजी ने फिर भरी हुंकार, नाकारा सिस्टम को दी वॉर्निंग
Nov 13 2017 9:00PM, Writer:सूरज
कभी इस पूर्व फौजी ने टिहरी की राजशाही के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका था। ये हैं उत्तरकाशी जिले के एकमात्र बचे स्वतंत्रता सेनानी। 91 साल के चिंद्रियालाल। अब इस बुजुर्ग को एक बार फिर से आवाज उठानी पड़ी है। ये बुजुर्ग सिस्टम की बेरुखी से बेहद परेशान हैं। दरअसल ये चाहते हैं कि गरीबों के लिए एक सामुदायिक भवन बनाया जाए। इसके लिए वो बते 4 सालों से कड़ी मेहनत कर रहे हैं। लेकिन बीचे चार साल से वो सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। अफसरों ने कभी भी इनकी मांग पर गौर करना उचुत नहीं समझा। यानी यूं कह दीजिए कि अफसरों के कानों में जूं तक नहीं रेंगी। आजादी के इस सिपाही ने चेतावनी दी है कि अगर इस परेशानी का निदान नहीं हुआ तो वो दिसंबर से धरने पर बैठ जाएंगे। चिंद्रियालाल ब्रह्मखाल जुणगा के रहने वाले हैं। उनका घर जिला मुख्यालय उत्तरकाशी से 50 किलोमीटर दूर है।
वहां वो अपनी जमीन पर गरीब लोगों के लिए सामुदायिक भवन बनाना चाहते हैं। खास बात ये है कि वो इसके लिए आर्थिक मदद देने को भी तैयार हैं। हैरानी की बात तो ये है कि बीते चार साल से उन्हें ये सामुदायिक भवन बनाने की इजाजत नहीं मिली। चिंद्रियालाल डीएम से लेकर सीएम तक सभी को ना जाने कितने पत्र लिख चुके हैं। जिला मुख्यालय में ये बुजुर्ग अफसरों की चौखट पर भटक रहे हैं। दरअसल जिस जमीन पर सामुदायिक भवन बनाया जाना है। वहां लोक निर्माण विभाग ने 20 साल पहले ब्रह्मखाल-जुणगा मोटर मार्ग निर्माण के दौरान मलबा उड़ेल दिया था। हैरानी देखिए कि ये मलबा 20 साल से अब तक नहीं हटाया गया। इसके अलावा दो साल पहले इस स्वतंत्रता सेनानी के नाम पर जिला पंचायत ने ब्रह्मखाल में एक रैन बसेरा बनाया था। उसमें बेहद घटिया क्वॉलिटी की निर्माण सामग्री लगाई गई।
चिंद्रियालाल जी का कहना है कि इसकी भी जांच कराई जाए। अब आपको इनकी कहानी भी बताते हैं। जुलाई 1927 में चिंद्रियालाल जी का जन्म हुआ था। वो सिर्फ चौथी कक्षा तक ही पढ़ पाए। उस वक्त टिहरी रियासत में राजशाही के खिलाफ आक्रोश पनप रहा था। 1944 में चिंद्रियालाल भी इस आंदोलन में कूद पड़े थे। उसी दौरान श्रीदेव सुमन टिहरी जेल में शहीद हुए थे। एक दिन धरासू के पास टिहरी राजा की पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था। इसके साथ ही उनका घर और जमीन कुर्क की गई। लेकिन, चिंद्रियालाल जी हारे नहीं और राजशाही के तख्तापलट तक आंदोलन से जुड़े रहे। अब इन्होंने एक बार फिर से हुंकार भर दी है। उन्हें अपार जनसर्थन भी मिल रहा है। अब देखना है कि क्या चिंद्रियालाल जी की मांग पूरी होगी या फिर वो धरने पर बैठ जाएंगे ? वक्त आने पर सब कुछ पता चल जाएगा।