बड़ी खबर: उत्तराखंड के मदरसों में संस्कृत और आयुर्वेद पढ़ाने की मांग !
Dec 30 2017 3:40PM, Writer:कपिल
उत्तराखंड के लिए एक बड़ी खबर निकलकर सामने आ रही है। बताया जा रहा है कि उत्तराखंड के मदरसों में संस्कृत पढ़ाने की मांग हुई है। प्रदेश की मदरसा वेलफेयर सोसाइटी ने प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को इस बारे में खत लिखा है। आपको बता दें कि मदरसा वेलफेयर सोसाइटी द्वारा उत्तराखंड में 207 मदरसों का प्रतिनिधित्व किया जाता है। खबर है कि 8 सितंबर को सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत को इस बारे में खत लिखा गया था कि मदरसों में भी संस्कृत और आयुर्वेद पढ़ाई जाए। पत्र में अपील की गई थी कि उत्तराखंड के मदरसों से संस्कृत के शिक्षकों को भी जोड़ा जाए। इससे मदरसों के पाठ्यक्रम में संस्कृत को जोड़ा जा सके। इंडियन एक्सप्रेस ने एक रिपोर्ट छापी है। इस रिपोर्ट के मुताबिक कुछ बड़ी बातें बताई गई हैं। इंडियन एक्सप्रेस ने इस रिपोर्ट को प्रमुखता से जगह दी है।
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रिपोर्ट के मुताबिक मदरसा वेलफेयर सोसाइटी के चेयरपर्सन सिब्ते नाबी ने कहा कि उत्तराखंड के 207 मदरसों ने हमारे इस सुझाव का खुशी से स्वागत किया है। इसके अलावा सिब्ते नाबी ने कहा कि हम चाहते हैं कि मदरसे के छात्रों का भविष्य उज्जवल हो और वो आयुर्वेद की पढ़ाई भी कर सकें। मदरसा वेलफेयर सोसाइटी के चेयरपर्सन ने कहा कि फिलहाल मदरसे के छात्रों के लिए ये नामुमकिन है क्योंकि आयुर्वेद की पढ़ाई में संस्कृत भाषा होती है। मदरसे के छात्रों को विषय का भाषायी ज्ञान नहीं है। उन्होंने केंद्र की मोदी सरकार से भी अपील की है। इस अपील में कहा कि उत्तराखंड में शिक्षा पर खर्च होने वाले पैसे का कुछ उपयोग मदरसों के 25,000 छात्रों को संस्कृत की शिक्षा देने के लिए होना चाहिए। हालांकि, उत्तराखंड के मदरसा बोर्ड ने मदरसा वेलफेयर सोसाइटी की इस मांग को अव्यावहारिक करार दिया है। उत्तराखंड के मदरसा बोर्ड ने इस बात को मानने से इनकार कर दिया है।
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मदरसा वेलफेयर सोसाइटी के इस सुझाव को एक सिरे से खारिज करते हुए उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड के डिप्टी रजिस्ट्रार अखलाक अहमद अंसारी ने कुछ बड़ी बातें बताई। उनका कहना है कि मदरसों में संस्कृत की शिक्षा को लेकर ऐसा कोई पत्र नहीं मिला है और ना ही किसी ने इस बारे में जानकारी दी है। उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड 297 मदरसे जुड़े हुए हैं। अंसारी का कहना है कि मदरसों के पाठ्यक्रम में संस्कृत को जोड़ने से तकनीकी समस्या पैदा होगी। उनका कहना है कि हिंदी और अंग्रेजी पहली प्राथमिकता हैं और इन्हें मदरसों में पढ़ाया जाना जरूरी है। इसके अलावा मदरसों में केवल एक ही भाषा पढ़ाई जा सकती है। उन्होंने बताया कि इसके लिए विकल्प के तौर पर अरबी और फारसी है। ऐसे में एक और भाषा संस्कृत को मदरसे के पाठ्यक्रम में जोड़ना अव्यावहारिक होगा। देखना है कि इस मामले में आगे क्या होता है।