गढ़वाल राइफल 237 वीर सपूतों की गर्जना, मातृभूमि की रक्षा के लिए खाई कसम
Mar 5 2018 6:01PM, Writer:कपिल
पहाड़ों से भी मजबूत हौसला, संमदर की लहरों को चीर देने की ताकत रखने वाले, दिन में 14 घंटे सिर्फ युद्धस्तर की तैयारी करने वाले, आंखों में उबाल मारता खून और देशभक्ति का कभी ना खत्म होने वाला जुनून, ये है गढ़वाल राइफल। जिसे देश की सबसे ताकतवर और तेज तर्रार सेना कहा जाता है। गढ़वाल राइफल, जिसकी आन बान और शान की चर्चाएं दुनिया का हर मुल्क करता है। कुछ वक्त पहले हमने आपको एक बात बताई थी कि देश की सेना में सबसे ज्यादा जवान उत्तराखंड के हैं। इन वीर जवानों ने मौका पढ़ने पर देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों को कुर्बान करने में जरा भी संकोच नहीं किया। एक बार फिर से गढ़वाल राइफल ने देश की सेना को 237 वीर सपूत दिए हैं। 'कदम-कदम बढ़ाए जा, खुशी के गीत गाए जा, ये जिंदगी है कौम की तू कौम पर लुटाए जा', इस गीत की स्वरलहरियों से लैंसडोन गूंज उठा।
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237 वीर सपूतों ने देश की रक्षा करने की सौगंध खाई। इस मौके पर गढ़वाल रेजीमेंट के ब्रिगेडियर इंद्रजीत चटर्जी ने जवानों से देश के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर करने का आह्वान किया। गढ़वाल राइफल्स रेजीमेंट सेंटर का भवानी दत्त परेड ग्राउंड एक बार फिर से इतिहास दोहरा रहा था। कोर-74 के 237 रिक्रूटों ने भारतीय थल सेना की ट्रेनिंग का अंतिम पग पार कर लिया। परेड के दौरान रिक्रूटों की जोश जगा देने वाली ड्रिल इस बात का संकेत थी कि चाहे कुछ भी हो जाए, देश पर नापाक नजर नहीं पड़ने देंगे। ब्रिगेडियर इंद्रजीत चटर्जी ने कहा कि गढ़वाल रेजीमेंट की वीरता के चर्चा देश में ही नहीं, बल्कि सात समंदर पार भी है। इस कसम परेड के दौरान वीर सपूतों के परिजन भी गढ़वाल के अलग अलग हिस्सों से आए हुए थे। अपने लाडले को थल सेना का सैनिक बनता देखकर हर मां-बाप का सीना फक्र से चौड़ा हो रहा था।
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परेड के दौरान सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए राइफलमैन सचिन रमोला को गोल्ड मेडल दिया गया। इसके अलावा राइफलमैन राहुल सिंह को सिल्वर मेडल से सम्मानित किया गया। राइफलमैन अनिल सिंह को कांस्य पदक से सम्मानित किया गया। इसके अलावा भी अलग अलग क्रियाकलापों के लिए वीर जवानों को सम्मानित किया गया। अफगान युद्ध में गढ़वाल राइफल के सूबेदार बलभद्र सिंह नेगी के साहस को देखकर तत्कालीन कमांडर-इन-चीफ फील्ड मार्शल सर एफएस रॉबर्टस् ने कहा था कि एक कौम जो बलभद्र जैसा आदमी पैदा कर सकती है, उनकी अपनी अलग बटालयिन होनी ही चाहिए। 1887 में गढ़वाल राइफल की स्थापना हुई और 1892 में अधिकारिक तौर पर इसे गढ़वाल राइफल्स की उपाधि मिली। इसके बाद प्रथम विश्वयुद्ध और दूसरे विश्व युद्ध में इस राइफल के जवानों ने अपनी वीरता का परिचय दुनिया को दिया था।