image: Uma bharti in harshil

पहाड़ में वहां तप कर रही हैं उमा भारती, जहां विष्णु जी का अभिषेक खुद करती है नदी की धारा

Mar 19 2018 11:16AM, Writer:आदिशा

उत्तराखंड से केंद्रीय मंत्री उमा भारती का बहुत पुराना नाता रहा है। देवभूमि में इस बार आ चुकी उमा भारती खुद मानती हैं कि उत्तराखंड में आकर उन्हें असी शांति मिलती है। कई बार माता अनुसूय़ा मंदिर में उन्हें ध्यान लगाते देखा गया है। लेकिन इस बार केंद्रीय पेयजल एवं स्वच्छता मंत्री उमा भारती हर्षिल पहुंचीं है। यहां पहुंचने के पीछे एक खास वजह बताई जा रही है। हर्षिल में श्रीलक्ष्मी-नारायण मंदिर है, जहां उन्होंने अनुष्ठान शुरू कर दिया है। साल 2017 में भी चैत्र नवरात्र के दौरान उमा भारती ने गंगोत्री के शीतकालीन पड़ाव मुखवा के चंदोमति माता मंदिर में नौ दिन तक मौनव्रत साधना की थी। उमा भारती शाम 6 बजे सड़क मार्ग से उत्तरकाशी पहुंचीं। इसके बाद वो वहां से हर्षिल के लिए रवाना हो गई। रविवार की रात उमा भारती ने हरि मंदिर में पूजा की थी।

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इस दौरान उमा भारती मंदिर की धर्मशाला में ही रुकी। बताया जा रहा है कि अब 25 मार्च उमा भारती इसी मंदिर में तप करेंगी। अब आपको यहां की कहानी भी बता देते हैं। उत्तरकाशी से करीब 75 किलोमीटर दूर पड़ता है हर्षिल कस्बा। ये जगह पर्यटन स्थल के रूप में दुनियाभर में विशेष पहचान रखती है। कहा जाता है कि यहां जलंध्री नदी के किनारे हरि मंदिर में भगवान विष्णु शिला रूप में परिवर्तित हुए थे। तब से इस जगह का नाम हरि शिला हुआ। बाद में हरि शिला को लोग हर्षिल के नाम से जानने लगे थे। इसका सीधा संबंध शिव महापुराण से है। समुद्र पुत्र जलंधर जब भगवान शंकर को युद्ध के लिए ललकारने लगा। उल्लेख किया गया है कि पहले युद्ध में भगवान शंकर जलंधर को हरा नहीं पाए। वजह ये थी कि जलंधर की पत्नी वृंदा महान पतिव्रता नारी थी।

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लेकिन, आखिर में भगवान विष्णु की मदद से भगवान शिव ने जलंधर का वध किया था। उस वक्त जलंदर की पत्नी वृंदा ने भगवान विष्णु को पत्थर हो जाने का श्राप दे दिया। भगवान विष्ण के आशीर्वाद से ही वृंदा तुलसी के रूप में बदली और हर्षिल के पास नदी के रूप में भी बहने लगी। आज भी हर्षिल में जलंध्री नाम की नदी बहती है और लक्ष्मी-नारायण शिला का अभिषेक करती है। केंद्रीय मंत्री उमा भारती के ध्यान में कोई व्यवधान ना पड़े, इसके लिए तमाम व्यवस्थाएं हर्षिल में की गई हैं। उमा भारती के बारे में कहा जाता है कि उन्हें उत्तराखंड से बेहद प्यार है। इस वक्त उन्हें स्वच्छ एवं निर्मल गंगा की जिम्मेदारी भी सौंपी गई है। इससे पहले वो मनणी माई, मठियाणा माई, कालीशिला, कालीमठ जैसे पवित्र स्थानों में भी तक कर चुकी हैं।


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