उत्तराखंड की 5 बेटियां जो पलायन से लड़ीं, खुद पैदा किये रोजगार के मौके
May 15 2018 2:51PM, Writer:शैलेश
किसी भी रास्ते पर कदम बढ़ाने से पहले हौसलों की जरूरत होती है। सही सोच, सही फैसला, सही वक्त और कभी ना टूटने वाले हौसले ही आपको कामयाबी के शिखर पर ले जाते हैं। राज्य समीक्षा के लेखों में हम आपको अक्सर उत्तराखंड की ऐसी ही कहानियों से रूबरू कराते रहते हैं। उत्तराखण्ड... जहां रोजगार की तलाश में हर महीने हजारों लोग शहर की ओर पलायन करते हैं। जहां पलायन की समस्या एक चुनावी मुद्दा है और हर बार चुनाव से पहले इस समस्या से लड़ने के वादों की झड़ी सी लग जाती है। कहते हैं जब समस्या होती है तभी उस समस्या से पार पाने का तरीका भी इजाद होता है... इस बात को उत्तराखंडी युवा बार-बार साबित करते आये हैं। बार-बार पहाड़ी युवाओं ने अपनी नई सोच से पलायन की समस्या से पार पाने का तरीका सुझाया है। राज्य समीक्षा के इस अंक में जानिये उत्तराखंड की पांच उन बेटियों के बारे में, जिन्होंने शहरी जीवन को छोड़ कर गाँव की ओर रुख किया और उदाहरण पेश किया कि रिवर्स-माइग्रेशन कैसे किया जाता है।
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दिव्या रावत

दिव्या के बारे में कौन नहीं जानता... दिव्या ने मशरूम की खेती को प्रोफेशनल तरीके से लिया। साथ ही इस खेती में उन्होंने अपने जैसी कई महिलाओं को काम भी दिया। दिव्या की सोच और सफलता पर आज हर किसी को नाज है। आज दिव्या प्रदेश में मशरूम गर्ल के नाम से जानी जाती हैं। इसके साथ ही उन्होंने देहरादून के मोथरोवाला में अपना प्रशिक्षण संस्थान भी चला रही हैं। दिव्या रावत को इस काम के लिए राष्ट्रपति द्वारा नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित भी किया जा चुका है।
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत उनसे मिलने के लिए खुद चल कर पहुचे थे जब वो खुद देखना चाहते थे कि आखिर किस तरह से उत्तराखंड की इस बेटी ने बहुमूल्य कीड़ाजड़ी को अपनी लैब में उगाया है। उत्तराखंड की इस बेटी ने कीड़ाजड़ी की एक ऐसी चाय को तैयार किया है, जो आपके स्वास्थ्य के लिए किसी वरदान से कम नहीं।
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रंजना रावत

रंजना रुद्रप्रयाग जिले के भीरी गॉव की रहने वाली हैं। शहर की अच्छी खासी नौकरी छोड़कर रंजना गांवों के लिए चल पड़ी और अमेरिकन सेफ्रॉन उगाई। रंजना की ये मेहनत रंग लाई और आज ग्रामीण स्वरोजगार मिशन के तहत कई बेरोजगारों को उन्नत खेती के गुर सिखा रही है। साथ ही रंजना ने मशरूम की खेती भी की है। इस तरह से रंजना रावत ने उत्तराखंड में रिवर्स माइग्रेशन की उम्मीदों को नया आयाम दिया है। इसके साथ ही स्वरोजगार की नई नीति को पंख लगा दिए हैं। इसके साथ ही खास बात ये है कि रंजना स्ट्रॉबेरी की खेती भी कर रही हैं। यूं तो स्ट्रॉबेरी की खेती जमीन पर ही होती है, लेकिन रंजना के गांव में इसे पाइप और बोतलों के जरिये हवा में टांग के किया जा रहा है।
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प्रियंका नौटियाल

प्रियंका केदारघाटी की लोकप्रिय बीजेपी नेत्री और पूर्व विधायक आशा नौटियाल की बेटी हैं। प्रियंका एक फार्मा कंपनी में बतौर माइक्रो बायोलॉजिस्ट नौकरी कर रही थी। स्वरोजगार का आईडिया आया और प्रियंका ने गांव में रहकर मशरूम का उत्पादन शुरू किया। प्रियंका ने 100 बैग के साथ अपनी पहली मशरूम यूनिट शुरू की है। इस काम में उन्हें रंजना रावत का साथ मिला। प्रियंका का कहना है कि अगर गांव के सभी लोग मिलकर मशरूम की खेती शुरू करें तो, पलायन और बेरोजगारी की तस्वीर बदल सकती है। गांव की महिलाओं को इस रोजगार से जोड़ने के लिए प्रियंका लगातार काम कर रही हैं। प्रियंका के पिता रमेश नौटियाल ने भी बेटी की इस मुहिम में पूरा साथ दिया है। बेटी की कोशिश की सराहना करते हुए आशा नौटियाल कहती हैं कि आने वाले वक्त में युवाओं के लिए ये रोजगार का एक नया रास्ता साबित हो सकता है।
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श्वेता तोमर

देहरादून के पास के ही कस्बे रानीपोखरी में जन्मी श्वेता तोमर के पिता का हमेशा से यह सपना था कि गाँव में कोई ऐसा कारोबार हो जिससे युवाओं को रोजगार के अवसर मिल सकें। एक दिन श्वेता के मन में गाँव में फार्म शुरू करने का आइडिया आया और वो बंगलोर से वापस देहरादून लौट आई। आज श्वेता की फार्म में 400 से ज्यादा बकरियां हैं। उन्होंने डेयरी का बिजनेस भी इससे जोड़ दिया है। इतना ही नहीं अब वो मुर्गी और गौ-पालन भी कर रही हैं। आज की तारीख में उनका सालाना टर्न-ओवर 10 से 15 लाख तक पहुँच गया है। आज श्वेता एक सफल किसान हैं, युवाओं के लिए एक मिसाल कायम करते हुए श्वेता तोमर एक ऐसे पायदान तक पहुँच चुकी हैं जहां उनके सामने शानदार भविष्य है।
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मनीषा और सुमन

इन दोनों बेटियों ने इलायची की खेती से एक नायाब रास्ता निकाला है। बाकी फसलों को जंगली जानवर काफी नुकसान पहुंचाते हैं लेकिन इलायची की फसल को जंगली जानवरों से कोई नुकसान नहीं होता।बड़ी इलायची को जानवर खाने में पसंद नहीं करते। मनीषा और सुमन ने करीब दस नाली जमीन में इलायची की खेती शुरू की। इन दोनों को इससे काफी फायदा भी मिल रहा है। इलायची की कीमत आज के वक्त में लोकल बाजार में 1500 रुपये प्रति किलोग्राम है। मनीषा और सुमन के साथ-साथ ही एक और युवा लक्ष्मण सिंह चौधरी भी बड़ी इलायची की खेती कर रहे हैं। बड़े पर्यावरणविदों ने भी इस काम की तारीफ है। ईटीवी द्वारा तैयार किया गया दोनों बहनों का ये वीडियो भी देखिए...
उत्तराखंड के युवा आज बेरोजगारी का रोना रो रहे हैं वहीँ दूसरी तरफ इन जैसी बेटियां हैं, जो नौकरी छोड़कर, अपने गांव वापस जाकर खेती के जरिए नाम, पैसा और शोहरत कमा रही हैं। सिर्फ हाथ पर हाथ रखकर बैठने से कुछ नहीं होता। इसके लिए आपको कोशिश करनी पड़ती है। कुछ प्रयास करने पड़ते हैं। तब जाकर आप सफलता के शिखर पर पहुंचते हैं। पहाड़ की इस ‘शक्ति’ को हमारा प्रणाम। जय उत्तराखंड।