अच्छी खबर: अब गढ़वाली में पढ़िए श्रीमद् भगवद् गीता, पहाड़ के महान लेखक को नमन
Jul 6 2018 1:44PM, Writer:कपिल
इस वक्त उत्तराखंड के लिए अपनी बोली और भाषा को बचाना एक चुनौती है। इस चुनौती से कैसे पार पाया जाए ? कुछ तो ऐसा करना होगा कि हम आगे आने वाली पीढ़ियों को भी कुछ संदेश दे सकें। ऐसे ही कुछ लोग हैं, जिन्होंने अपनी बोली और भाषा को बचाने के लिए जीवन भर मेहनत की है। वो लोग चले गए लेकिन अपने पीछे कुछ ऐसी यादें छोड़ गए, जो उत्तराखंड की आने वाली पीढ़ियों के लिए एक तोहफा है। ऐसी ही एक महान आत्मा थे स्वर्गीय जगदीश प्रसाद थपलियाल। एक शिक्षक के रूप में उन्होंने आजीवन शिक्षा के लिए सेवा की, तो एक लेखक के रूप में वो देवभूमि को एक तोहफा दे गए। स्वर्गीय जगदीश प्रसाद थपलियाल ने श्रीमद भगवद गीता का गढ़वाली में अनुवाद किया था और उसे गढ़गीता का नाम दिया था। अब एक बेहतरीन काम हुआ है।
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मुख्यमंत्री आवास में स्वर्गीय जगदीश प्रसाद थपलियाल की पुस्तक ‘श्री गढ़गीता जी’ का विमोचन किया। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने गढ़वाली में संदेश देते हुए बताया कि ‘स्व. जगदीश प्रसाद थपलियाल जी कि गढ़वळि मा लिखीं किताब "श्री गढ़गीता जी" कु विमोचन करि। उत्तराखंड कि लोकभाषा मा गीता कु अमृत ज्ञान हर घर तक पौंछाण म यु प्रयास सफल होउ इनि मेरि कामना च। भगवत गीता जीवन मा निष्काम कर्म कु रैबार दीण वलु दुनिया कु सबसे महान ग्रंथ च’। उत्तराखंड में इस वक्त लोक संस्कृति और लोक भाषा को बढ़ावा देने के लिये कई प्रयास किये जा रहे हैं। स्वर्गीय जगदीश प्रसाद थपलियाल द्वारा भगवद्गीता का गढ़वाली भाषा में पद्यात्मक व गद्यात्मक रूपों में इस पवित्र पुस्तक को लिपिबद्ध करना वास्तव में लोकभाषा के लिए एक बड़ी सेवा है।
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इस मौके पर पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी भी मौजूद थे। उन्होने कहा कि स्व० जगदीश प्रसाद थपलियाल महज एक शिक्षक ही नहीं थे, वे गुरू होकर भी जीवन भर जिज्ञासु छात्र जैसा विचारपूर्ण, कर्ममय जीवन बिताने की चेष्टा में संलग्न रहे। गीता ने उनके जीवन में मार्ग दर्शक का कार्य किया। उन्होंने गढ़वाली भाषा पर ये उपकार किया कि उन सूक्तिपरक महान विचारों की प्रस्तुति अपनी लोक बोली में करने की ठानी। पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी ने कहा कि ये सभी उत्तराखंडियों पर स्वर्गीय जगदीश प्रसाद थपलियाल का उपकार है।