image: story of leutinent hari singh bisht

उत्तराखंड का जांबाज...सीने पर गोली खाई, लेकिन दो खूंखार आतंकियों को मारकर गया

Jul 24 2018 3:16PM, Writer:कपिल

राज्य समीक्षा की कोशिश रहती है कि आपको उन शहीदों की याद दिलाते रहें, जिन्होंने बॉर्डर पर अदम्य साहस और शौर्य का परिचय देते हुए वीरता की एक अलग ही गाथा लिख दी। देवभूमि ने हर बार देश को ऐसे वीर दिए हैं, जिन्होंने अपने पराक्रम से दुश्मन के दांत खटटे कर दिए। ऐसे ही एक वीर जांबाज थे लेफ्टिनेंट हरि सिंह बिष्ट। जब जब देश में वीर अफसरों के शौर्य की कहानियां सुनाई जाती हैं, उनमें हरि सिंह बिष्ट का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। 31 दिसम्बर 1974 को उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के डोबा नामक गांव में हरि सिंह बिष्ट का जन्म हुआ था। एक सामान्य परिवार में जन्मे हरि सिंह बिष्ट के दिल में बचपन से ही देशसेवा का जज्बा उबाल मारता था। पिता पूरन सिंह आर्मी में थे, तो हरि सिंह बिष्ट के दिल में देश के लिए प्यार पहले से ही था।

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अपनी पढ़ाई-लिखाई पूरी करने के बाद हरि सिंह बिष्ट 11 दिसम्बर 1999 को गोरखा राइफल्स में आर्मी ऑफिसर के रूप में तैनात हुए। साल 2000 की बात है, हरि सिंह बिष्ट की पोस्टिंग जम्मू-कश्मीर के पुंछ में थी। इस दौरान उन्हें पता चला कि पूंछ जिले के मानधार सेक्टर के मंझियारी गांव में आतंकियों का एक गिरोह छुपा हुआ है। ये और कोई नहीं बल्कि खूंखार आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिद्दीन के आतंकी थे। बस फिर क्या था..लेफ्टिनेंट हरि सिंह बिष्ट अपन जवानों के साथ आतंकियों का खात्मा करने के लिए निकल पड़े। आतंकियों को इस बात की खबर लगी तो उनकी तरफ से फायरिंग शुरू हो गई। इस दौरान हरि सिंह बिष्ट को गोली लग गई। गोली लगने के बाद भी लेफ्टिनेंट हरि सिंह बिष्ट मैदान-ए-जंग में टिके रहे।

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गोली लगने के बावजूद इस लेफ्टिनेंट ने आतंकी संगठन हिजबिल मुजाहिद्दीन के दो बड़े आतंकियों को मार गिराया था। हरि सिंह बिष्ट आतंकियों से लड़ते हुए देश के लिए शहीद हो गए थे। लेकिन, शहादत हासिल करने से पहले इस फौजी ने ऐसा काम कर दिया, जिसे देश हमेशा याद रखता है और रखता रहेगा। आपको बता दें कि हाल ही में शहीद लेफ्टिनेंट हरि सिंह बिष्ट के परिवार को पावर विंग नाम की संस्था ने सम्मानित किया है। ये उत्तराखंड के शहीदों के दिल में उफान मारता देशभक्ति का जुनून है, जो युगों युगों तक जिंदा रहेगा। आपको यहां ये भी बता दें कि करगिल युद्ध के दौरान उत्तराखंड के सबसे ज्यादा सैनिकों ने कुर्बानियां दी थीं। आज देश को सबसे ज्यादा फौजी और आर्मी अफसर देने के मामले में उत्तराखंड अव्वल नंबर पर है।


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