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पहाड़ का अमर शहीद.. जिसने 84 दिन तक कुछ नहीं खाया, पानी की एक बूंद भी नहीं पी

Jul 25 2018 10:53AM, Writer:कपिल

"मैं अपने शरीर के कण-कण को नष्ट हो जाने दूंगा लेकिन टिहरी रियासत के नागरिक अधिकारों को कुचलने नहीं दूंगा"। एक हुंकार उठी थी पहाड़ से, जिसे स्वर्णाक्षरों में लिखा गया। 25 जुलाई 1944 के दिन उत्तराखंड ने अपना लाल खो दिया था। आज के ही दिन सिर्फ 29 साल की उम्र में सत्ता और राजशाही को हिला कर रख देने वाले श्री देव सुमन इस दुनिया को छोड़कर चले गए थे। इनकी कहानी पढ़कर आपके रौंगटे खड़े हो जाएंगे क्योंकि जेल में उन्हें ऐसी सजाएं दी गई, जिनके बारे में जानकर ही रूह कांप उठती है। 25 मई 1916 को श्रीदेव सुमन का जन्म टिहरी गढ़वाल में हुआ था। 1930 में सिर्फ 14 साल की उम्र में ही वो सत्याग्रह आंदोलन में कूद पड़े थे। इस दौरान उन्हें जेल जाना पड़ा। उसके बाद उन्होंने टिहरी रियासत की नीतियों के खिलाफ आंदोलन शुरू किया था। टिहरी को राजशाही से मुक्त करवाने के लिए शुरू हुए इस आंदोलन ने इतिहासल बदलकर रख दिया था। आंदोलन कर रहे श्रीदेव सुमन को 27 दिसम्बर, 1943 के दिन चम्बाखाल से गिरफ्तार किया गया। 30 दिसम्बर को उन्हें टिहरी जेल भिजवा दिया गया।

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30 दिसम्बर 1943 से 25 जुलाई 1944 तक 209 दिन सुमन ने टिहरी जेल में बिताये। टिहरी जेल को इस वक्त की सबसे नारकीज जेल कहा जाता था। श्रीदेव सुमन के खिलाफ षड़यंत्र रचा गया और 31 जनवरी, 1944 को उन्हें सजायाफ्ता मुजरिम बना दिया गया। इस दुर्व्यवहार से तंग आकर सुमन ने 29 फरवरी 1944 से 21 दिन का उपवास शुरू कर दिया। इसके बाद भी टिहरी राजा की तरफ से कोई जवाब नहीं मिला तो श्री सुमन ने 3 मई, 1944 से इतिहास का सबसे कठिन और नारकीय आमरण अनशन शुरु कर दिया। इस दौरान श्रीदेव सुमन को पागल साबित करने की कोशिश की गई। उनके मनोबल को डिगाने की कोशिश की गयी। लेकिन पहाड़ का ये बेटा अपनी बात पर कायम रहा। अनशन से सुमन की हालत बिगड़ती चली गई और जेल में उनके खिलाफ अत्याचार भी बढ़ते चले गए। जेल से ही ये बात फैला दी गई कि सुमन को न्यूमोनिया हो गया है। सच तो ये था कि उन्हें कुनैन के इन्ट्रावेनस इन्जेक्शन लगाये गये थे।

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कुनैन के इंजेक्शन की वजह से श्रीदेव सुमन के शरीर में पानी की कमी हो गई। वो पानी-पानी चिल्लाते रहे लेकिन पानी के बदले उनसे लिखित तौर पर अपना अनशन वापस लेने को कहा गया। जीवटता देखिए..सुमन ने पानी पीने से इनकार कर दिया। 20 जुलाई की रात से उन्हें बेहोशी आने लगी थी और 25 जुलाई 1944 को शाम करीब 4 बजे इस अमर सेनानी ने अपने देश और अपने आदर्शों के लिये अपने प्राणों की आहुति दे दी। इसके बाद भी जेल प्रशासन की क्रूरता नहीं थमी। सुमन की लाश को एक कम्बल में लपेट कर भागीरथी और भिलंगना के संगम पर तेज धारा में फेंक दिया गया। सुमन की शहादत का जनता पर जबरदस्त असर हुआ और राजशाही के खिलाफ खुला विद्रोह शुरू हो गया। उनके बलिदान से उत्तराखंड की जनता में आन्दोलन का ऐसा उन्माद उत्पन्न हुआ कि 15 जनवरी 1948 को टिहरी सियासत राजशाही से मुक्त हो गयी। 1 अगस्त 1949 को टिहरी गढ़वाल रियासत का भारत गणराज्य में विलय हो गया। आज याद करें और नमन करें पहाड़ के इस वीर सपूत को।


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