Video: पहाड़ के मंगलानंद डबराल..विदेश छोड़कर गांव लौटे, खेती से दिया पलायन को जवाब
Aug 9 2018 7:48PM, Writer:कपिल
तभी आप टिहरी गढ़वाल के चौपड़ीयाल गांव गए हैं ? अगर नहीं गए हैं, तो जरूर जाएं। खेती के जरिए पलायन को किस तरह से रोका जा सकता है, आप ये सीख पाएंगे। दरअसल यहां मंगलानंद डबराल जी रहते हैं। इनको खेती का इतना जबरदस्त ज्ञान है कि बड़े-बड़े कृषि वैज्ञानिक इनके सामने फेल हो जाएंगे। इसके लिए उन्होंने कहीं से कुछ नहीं सीखा। मंगलानंद डबराल जी सिर्फ पांचवी पास हैं। आज मंगलानंद डबराल अपने गांव में कीवी की खेती कर रहे हैं। मंगलानंद डबराल वो किसान हैं जिन्होंने विदेशी सब्जियों का भी उत्तराखंड में बड़े पैमाने पर उत्पादन कर दिया है। जीबी पंत कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक भी उनके इस काम की तारीफ करते हैं। आज आपको इनकी बागबानी में ब्रोकली, लैटीयूज, जॉरसले, आइस बर्ग, चाइनीज गोभी जैसी महंगी सब्जियां भी दिखेंगी। इसके लिए हम आपको बकायदा एक वीडियो भी दिखा रहे हैं।
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कभी मंगलानंद डबराल नौकरी के लिए दर-दर भटकते थे। यहां तक कि वो कुवैत में ड्राइवर की नौकरी करते थे। वहां मन नहीं लगा और मंगलानंद डबराल 80 के दशक में अपने गांव वापस लौटे। तबसे मंगलानंद ने खेतीबाड़ी को ही अपना हथियार बनाया। उन्होंने सबसे पहले गोभी की खेती शुरू की। धीरे धीरे अपने गांव की बंजर पड़ी जमीन को संवारने में जुट गए। आज आप उनकी बागबानी देखेंगे तो गर्व करेंगे। मंगलानंद डबराल ने बाग-बगीचे तो लगाए हैं, साथ ही उन्होंने अपने ही गांव में दो पॉलीहाउस भी बनाए हैं। इसके साथ ही उन्होंने दो बड़े बगीचों में 15 सौ से ज्यादा फलदार वृक्ष लगाए हैं। अपने हौसले के दम पर मंगलानंद डबराल ने एक मिसाल कायम की और आज उनके तीनों बेटे भी इसी काम में अपने पिता का साथ दे रहे हैं।
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कभी कुछ पौधों से अपना नया जीवन शुरू करने वाले मंगलानंद डबराल आज किवी के बड़े बागवान चला रहे हैं। वैज्ञानिक विधि से ये पौध तैयार की और दूसरे किसनों को भी इसका उत्पानद करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। मंगलानंद डबराल भले ही पांचवीं पास हैं लेकिन आज उनके पास खुद कृषि वैज्ञानिक कुछ सीखने आते हैं। मंगलानंद डबराल ने खुद से ही वर्मी कम्पोस्ट बनाई है और इसी से वो फसलों को तैयार करते हैं। वो फसलों के लिए कोई कीटनाशनक भी नहीं खरीदते बल्कि गोमूत्र, अखरोट, राख, नीम से कीटनाशक तैयार करते हैं। वो दूसरे किसानों को भी इसका तरीका बताते हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि आज उनके सिखाए हुए 500 से ज्यादा किसान उसी तरह से जैविक खेती कर रहे हैं। पलायन-पलायन तो हर कोई करता है। इसे रोकना है, तो मंगलानंद डबराल से सीखिए।