मर गयी हैं स्वास्थ्य सेवाएं...उत्तराखंड के सबसे बड़े अस्पताल में 36 घंटों में 4 नवजातों की मौत
Aug 17 2018 12:10PM, Writer:कपिल
उत्तराखंड के सबसे बड़े सरकारी अस्पतालों में से एक सुशीला तिवारी अस्पताल से दुखद घटना सामने आ रही है। हल्द्वानी के सुशीला तिवारी अस्पताल में 36 घंटों के अंदर 4 नवजातों की मृत्यु हुई है। बीती 13 अगस्त से 15 अगस्त की शाम तक 4 नवजात बच्चों की मौत से हड़कंप मच गया है। अस्पताल प्रशासन का इस घटना पर कहना है कि ये सभी बच्चे कमजोर और अस्वस्थ थे। पहली घटना में उधम सिंह नगर के खटीमा में रहने वाले संजय की भाभी प्रभावती को खटीमा के सरकारी अस्पताल से रेफर किया गया और 13 अगस्त की रात 11 बजे हल्द्वानी के सुशीला तिवारी अस्पताल लाया गया। 3 घंटों के बाद भी रात के 2 बजे तक किसी भी डॉक्टर ने बच्चे की तरफ ध्यान नहीं दिया। इसके बाद 30 मिनट बच्चे की जांच की गयी, 2:30 बजे डॉक्टरों ने बच्चे का ऑपरेशन किया। 15 अगस्त की शाम 4:30 बजे बच्चे ने दम तोड़ दिया।
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दूसरी घटना में पास के ही कोटाबाग में रहने वाले महेश कांडपाल अपनी पत्नी रीता कांडपाल को लेकर बुधवार यानि कि 15 अगस्त को दोपहर 12 बजे अस्पताल पहुंचे थे। महेश का कहना है कि अस्पताल में डॉक्टर ने नॉर्मल डिलीवरी की बात कही थी। रीता दर्द से तड़पती रही और अस्पताल के डॉक्टर अंदर सोते रहे। रात के 3 बजे डॉक्टर आयी। इसके बाद डिलीवरी की गयी, जिसके कुछ ही देर बाद बच्चे की मौत हो गई। महेश का ये भी कहना है कि बच्चे की मौत के बाद से अस्पताल प्रशासन उनसे किसी कागज पर दस्तखत करने का दबाव बना रहा है। तीसरी घटना में हल्दूचौड़ के भुवन सिंह अपनी पत्नी खष्टी नेगी को 15 अगस्त को ही रात 12 बजे लेकर सुशीला तिवारी अस्पताल पहुंचे थे। इनको भी डॉक्टरों ने परीक्षण के बाद नार्मल डिलीवरी करने की बात कही। सुबह 4:30 बजे डिलीवरी हुई और उसके बाद बच्चा 2 घंटे तक जीवित था। इसके बाद उसकी भी मृत्यु हो गई। भुवन का कहना है कि बच्चे के गले में प्रसव के दौरान गंदा पानी जाने से उसकी मौत हुई है।
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उत्तराखंड में कुमायूं के सबसे बड़े अस्पताल में महज डेढ़ दिनों के भीतर 4 नवजातों की मौत ने एक बार फिर उत्तराखंड में स्वस्थ्य सेवाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ पहाड़ों में बिना स्वस्थ्य सेवाओं के जीवन यापन करना उत्तराखंडियों की मजबूरी हो गयी है। आये दिन अस्पताल न पंहुच पाने के कारण पहाड़ों में आपदा के बीच ही सड़क किनारे या किसी पुल पर प्रसव की घटनाएं सामने आती रहती हैं। दूसरी तरफ सभी आधुनिक सुविधाओं वाले अस्पतालों में भी इस तरह नवजातों के जीवन के साथ हो रहे खिलवाड़ का आखिर जिम्मेदार कौन है ? जब प्रसव पीड़ा में एक मां बाहर रो रही हो ऐसे में कोई डॉक्टर अपना दायित्व छोड़कर.. सो कैसे सकता है ? उत्तराखंडियों और उनके बच्चों की जिंदगी से इस तरह हो रहे खिलवाड़ का आखिर सबब क्या है ?