केदारनाथ में 25 अगस्त को ऐतिहासिक मेला, इस दिन विष ग्रहण करते हैं भगवान शिव
Aug 23 2018 4:43PM, Writer:आदिशा
उत्तराखंड को परंपराओं की भूमि कहा जाता है। इसकी वजह वो मान्यताएं भी हैं, जो अपने आप में दुनिया से बेहद अलग हैं। रौंगटे खड़े कर देने वाले इन नज़ारों को देखकर अहसास होता है कि वास्तव में देवभूमि स्वर्ग से बढ़कर है। खासतौर पर जब बात केदारनाथ की हो, तो श्रद्धा का भाव खुद-ब-खुद मन में आ जाता है। अगर आप केदारघाटी की एक अनूठी परंपरा से रू-ब-रू होना चाहते हैं तो 25 अगस्त को केदारनाथ या केदारघाटी में जरूर आइए। रक्षाबंधन से पहले वाली रात केदारनाथ में भव्य उत्सव होता है। रात के 9 बजे से सुबह के 4 बजे तक ये भव्य पूजा होती है। सदियों से ये चली आ रही इस परंपरा को देखने हर साल भारी संख्या में श्रद्धालु केदारनाथ में मौजूद रहते हैं। अब जरा ये भी जान लीजिए कि इस परंपरा को क्या कहते हैं और कैसे इसे निभाया जाता है।
यह भी पढें - केदारनाथ को क्यों कहते हैं ‘जागृत महादेव’ ?, दो मिनट की ये कहानी रौंगटे खड़े कर देगी
स्थानीय भाषा में इस परंपरा को भतूज कहा जाता है। इस दिन केदारघाटी के क्षेत्रों में उपजे अनाज जैसे धान, झंगोरा, चावल, कौंणी का लेप भगवान शिव के लिंग को लगाया जाता है। अनाज से ही शिवलिंग को दिव्य रूप देकर सजाया जाता है। आखिर ऐसा क्यों होता है ? इसके पीछे एक बड़ी मान्यता है। शास्त्र कहते हैं कि भगवान शिव ने हलाहल विष को पीकर पूरे विश्व का कल्याण किया था। हलाहल जैसे विनाशकारी विष को पीकर महादेव ने त्रिदेवों में अलग ही स्थान ग्रहण किया था। कहा जाता है कि भतूज वाले दिन भगवान शिव अनाज को खुद ग्रहण करते हैं और उसमें पाए जाने वाले किसी भी तरह के विष का प्रभाव खत्म कर देते हैं। इस तरह से महादेव हर साल अपने भक्तों पर कृपा बरसाते हैं। स्थानीय मान्यताओं कहती हैं कि जगहों जगहों से इस अनाज को लाकर भगवान शिव को चढ़ाया जाता है।
यह भी पढें - गढ़वाल के महान विद्वान को नमन, दुनिया ने अब देखी बदरीनाथ जी की असली आरती
सुबह 4 बजे तक दिव्य साधना होती है और इसके बाद नित्य पूजा-अर्चना के बाद दर्शनों का सिलसिला शुरू होता है। केदारनाथ के साथ साथ गुप्तकाशी के काशी विश्वनाथ मंदिर में भी इस परंपरा का सदियों से निर्वहन हो रहा है। घुणेश्वर महादेव और कोलेश्वर महादेव ऊखीमठ में भी भतूज मेले को मनाने की परंपरा है। इस बार 26 अगस्त को रक्षाबंधन पड़ रहा है। रक्षाबंधन से पहले वाली रात यानी 25 अगस्त को इस उत्सव को मनाया जाएगा। अन्नकूट मेला यानी भतूज मेले की तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। इस बार मंदिर समिति इस मेले को और भी भव्य रूप दे रही है। तो तैयार हो जाइए और केदारघाटी के इस भव्य उत्सव में आकर भगवान शिव का प्रसाद पाइए। क्योंकि महादेव की नगरी की बात ही अलौकिक है, यहां आपको सुकून और शांति मिलेगी।