पहाड़ की बंजर जमीन से दूर की बेरोजगारी, पौड़ी गढ़वाल के विजेंद्र सिंह रावत को सलाम
Aug 24 2018 6:07PM, Writer:रश्मि पुनेठा
उत्तराखंड में बेरोजगारी आज एक अहम मुद्दा है। लेकिन पौड़ी जिले के कलुण गांव में एक शख्स ने अपनी जिद्द से कई लोगों को आज जीने का मकसद दे दिया है। इसे इस शख्स का जुनून ही कहा जाएगा कि उन्होंने वो काम कर दिखाया है, जिसकी लोग कल्पना भी नहीं कर सकते। विजेंद्र सिंह रावत नाम के इस शख्स ने आज अपनी मेहनत से पौड़ी जिले के पाबौ ब्लॉक की कलुण ग्राम पंचायत में बंजर पड़ी 60 हेक्टेयर ज़मीन की शक्ल बदल दी है। जल्द ही गांव की बंजर ज़मीन पर लेमनग्रास लहलहाती नजर आने वाली है। विजेंद्र सिंह रावत ने अपने गांव की किस्मत बदलने का जिम्मा उठाया है, जिसमें उन्हें लगभग चार दर्जन ग्रामीणों का साथ मिला। खास बात यह है कि इस मुहिम में विजेंद्र सिंह रावत के साथ सबसे ज्यादा महिलाएं जुड़ी है।
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इन लोगों ने फिलहाल 5 हेक्टेयर ज़मीन पर लेमनग्रास के तीन लाख पौधे रोपे हैं। फसल तैयार होने तक गांव में ही तेल पिरोने का प्लांट लगाया जाएगा। आपको बता दे कि लेमनग्रास के तेल का उपयोग विभिन्न उत्पादों को बनाने में किया जाता है। इसके तेल को शैंपू, इत्र, साबुन, सौंदर्य प्रसाधन आदि बनाने में इस्तेमाल किया जाता है। इस तेल का बाजार मूल्य प्रति लीटर करीब एक हजार रुपये है। गांव की करीब 60 हेक्टेयर ज़मीन बंजर है। जिसमें से 5 हेक्टेयर के लिए मनरेगा के तहत देहरादून के सेलाकुई स्थित पौधशाला से 3 लाख पौधे मंगवाएं गए । इन पौधों की लागत 75 पैसे प्रति पौधा आई है। बता दे कि लेमनग्रास की खेती के पहले उत्पादन दस से 12 महीने तक का वक्त लग जाता है। लेकिन इसके बाद खेती साल में तीन फसल देती है।
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विजेंद्र ने अपनी सोच को हकीकत में बदलकर आज अपने गांव के लोगों की आर्थिक स्थिति सुधारने की दिशा में काम किया है। जिसे देखकर उम्मीद की जा सकती है कि प्रदेश के दूसरे इलाकों में इस तरह की पहल की जाएं ताकि पहाडों से हो रहे पलायन को रोका जा सके। मुंबई की एक निजी कंपनी में बतौर जनरल मैनेजर काम कर रहे विजेंद्र सिंह रावत ने नौकरी छोड़कर लगभग एक साल पहले अपने गांव का रुख किया। जिसके बाद उन्होंने गांव में स्वरोजगार की दिशा में काम शुरु किया। इसके लिए उन्होंने अपने साथ ग्रामीणों को भी शामिल किया। हालाकि शुरुआत में बंजर ज़मीन पर लेमनग्रास रोपने की बात पर लोग राज़ी नहीं हुए थे। लेकिन कुछ कोशिशों के बाद लोग उनके साथ जुड़ते चले गए। आज कलुण के सभी परिवार इस योजना से जुड़ चुके हैं।