image: cm trivendra singh rawat targeted by his own people

सीएम त्रिवेंद्र के दुश्मन तो अपने ही निकले! इन चाटुकार ‘झांपुओं’ का क्या होगा ?

Sep 6 2018 6:10PM, Writer:मिथिलेष नौटियाल

उत्तराखंड में बरसात के मौसम के बाद नदियां और सियासत उफान पर है। सियासत के घाघ शिकारी अपने तीर चला रहे हैं और निशाना त्रिवेंद्र पर है। इतना जरूर है कि ये शिकारी अपने मकसद में कामयाब तो नहीं हुए लेकिन सीएम त्रिवेंद्र के चारों तरफ सियासी चक्रव्यूह को तैयार करने में कसर भी नहीं छोड़ रहे। अगर आप वास्तव में गौर करेंगे, तो 18 साल के उत्तराखंड में सिय़ासी साजिशों के अलावा कुछ भी नज़र नहीं आएगा। क्यों अब तक उत्तराखंड के जन्म से समस्याएं जस की तस हैं ? इसकी वजह वो घाघ नेता हैैं, जो उन्माद पैदा कराना जानते हैं, लड़ाना जानते हैं, दिलों में नफरत पैदा कराना जानते हैं। त्रिवेंद्र सिंह रावत के खिलाफ डेढ़ साल के भीतर ये तीसरी साजिश है। पहले टी पार्टी, फिर उत्तरा बहुगुणा प्रकरण और अब गाने के बहाने निशाना।

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ये बात सच है कि उत्तराखंड के अति महत्वाकांक्षी बीजेपी नेताओं को त्रिवेंद्र पच नहीं रहे। दरअसल त्रिवेंद्र के आने के बाद से उनकी मनमानियों पर लगा लगी है, उनका खाना-पीना बंद है, कमाई ठप हो गई है, सिफारिश भी नहीं चलती, ट्रांसफर और पोस्टिंग के धंधे की भी वाट लगी है। ऐसे में उन घाघ नेताओं को ये बातें पच नहीं रही। दिल्ली दरबार में शिकायत लेकर जाओ को सुन नहीं जाती। ये पुरानी वाली नहीं बल्कि मोदी और शाह की बीजेपी है, जहां बागी माफ नहीं किए जाते। सीएम त्रिवेंद्र पर पीएम मोदी और अमित शाह का भरोसा कायम है। ये भरोसा आगे भी कायम रहेगा। इसलिए उत्तराखंड के ही कुछ घाघ नेताओं ने ऐसा नायाब फार्मूला निकाला गया है कि बड़े बड़े बखेड़े खड़े किए जा रहे हैं। सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरी उत्तरा बहुगुणा वाले प्रकरण ने।

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एक सुनियोजित साजिश, टारगेट पर नजरें और सही तरह से निशाना लगाने की कोशिश की गई थी। वो भी कामयाब नहीं सकी। अब तो बीजेपी के नेता भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार कर रहे हैं कि त्रिवेंद्र सरकार को नुकसान पंहुचाने वाले अपने ही हैं। अब ज़रूरत उन नामों को सार्वजनिक करने की है। वरना इस तरह तो उत्तराखंड अस्थिरता के भयानक द्वंद में फंस जाएगा। 18 साल में सिर्फ एक एनडी तिवारी ही 5 साल टिक पाए। राष्ट्रपति शासन तक लग चुका है लेकिन सत्ता के लालची देवभूमि को आबाद देखना नहीं चाहते। उनकी रोज़ी-रोटी भी इसी से चलती है। त्रिवेंद्र सिंह रावत को चाहिए कि ऐसे 'झापुओं ' को खोज करें और सभी के सामने लाएं। जनता को पता होना चाहिए कि आखिर वो कौन है, जो जनता की ही मर्जी चलने नहीं दे रहा।


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