image: Khemraj Sundriyal Selected for Padma Shri

उत्तराखंड: सुमाड़ी गांव के खेमराज सुंद्रियाल को मिला पद्मश्री, हैंडलूम को बनाया ग्लोबल ब्रांड.. जानिये कहानी

उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के सुमाड़ी गांव के खेमराज सुंद्रियाल को कला क्षेत्र में पद्मश्री सम्मान के लिए चुना गया है। पानीपत हैंडलूम को देश-विदेश तक पहचान दिलाने वाले खेमराज सुंद्रियाल की संघर्ष भरी यात्रा आज नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा बन गई है।
Jan 26 2026 9:23PM, Writer:राज्य समीक्षा डेस्क

उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के सुमाड़ी गांव के निवासी और वर्तमान में हरियाणा के पानीपत में रहने वाले खेमराज सुंद्रियाल को कला के क्षेत्र में पद्मश्री सम्मान के लिए चुना गया है। यह खबर सामने आते ही सुमाड़ी गांव में खुशी और गर्व का माहौल बन गया। ग्रामीणों ने एक-दूसरे को लड्डू बांटकर इस उपलब्धि का जश्न मनाया और इसे पूरे क्षेत्र के लिए सम्मान का क्षण बताया। माना जाता है कि पानीपत के हैंडलूम उत्पादों को देश-विदेश तक पहचान दिलाने में खेमराज सुंद्रियाल की अहम भूमिका रही है।

Khemraj Sundriyal Selected for Padma Shri

सोमवार सुबह से ही सुमाड़ी गांव में उत्साह देखने को मिला। पद्मश्री सम्मान की घोषणा को लेकर गांव के लोग इसे अपनी मिट्टी की जीत मान रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यह सम्मान सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे गांव की मेहनत, संस्कार और संघर्ष की पहचान है। करीब 83-84 वर्षीय खेमराज सुंद्रियाल ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव सुमाड़ी से प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने श्रीनगर गढ़वाल से दसवीं तक की पढ़ाई पूरी की और वहीं से डिप्लोमा भी हासिल किया। गांव के लोगों के अनुसार, पढ़ाई के दिनों में संसाधन सीमित थे, लेकिन उनका लक्ष्य और अनुशासन हमेशा मजबूत रहा।

रोजाना करते थे 15 किलोमीटर की कठिन यात्रा

ग्रामीण मोहन चंद्र काला बताते हैं कि उच्च शिक्षा के लिए खेमराज सुंद्रियाल को श्रीनगर जाना पड़ता था। इस दौरान वे रोजाना करीब 15 किलोमीटर की कठिन दूरी पैदल या साधनों के सहारे तय करते थे। इसके बावजूद उनकी पढ़ाई और मेहनत में कभी कमी नहीं आई। गांव के युवाओं के लिए उनका यह संघर्ष आज भी प्रेरणा है। शिक्षा पूरी करने के बाद खेमराज सुंद्रियाल रोजगार की तलाश में गांव से बाहर निकले। संघर्षों से भरी इस यात्रा में उन्होंने अलग-अलग स्थानों पर काम किया और धीरे-धीरे हैंडलूम के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी मेहनत, हुनर और अनुभव ने उन्हें ऐसे मुकाम तक पहुंचाया, जहां आज उनका नाम देश के सम्मानित कारीगरों में गिना जा रहा है।

1975 में पानीपत पहुंचकर शुरू हुआ ‘असल सफर’

बताया जाता है कि खेमराज सुंद्रियाल 1975 में पानीपत बुनकर सेवा केंद्र पहुंचे थे। यहीं से उनके जीवन का वह अध्याय शुरू हुआ, जिसने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहचान दिलाई। पानीपत की बुनकरी संस्कृति और टेक्सटाइल इंडस्ट्री से जुड़कर उन्होंने न केवल खुद को स्थापित किया, बल्कि हजारों बुनकरों को नई दिशा दी। खेमराज सुंद्रियाल ने लंबे समय तक खड्डी (हाथ से कपड़ा बुनने की मशीन) पर काम किया। इसके बाद वे टेक्सटाइल इंडस्ट्री से जुड़े और ऐसे डिजाइन तैयार किए जो भारत के साथ-साथ विदेशों में भी लोकप्रिय हुए। उनकी कला ने हैंडलूम उद्योग को आधुनिक बाजार की जरूरतों से जोड़ने का काम किया।

हजारों लोगों को दी ट्रेनिंग, रोजगार का भी बना सहारा

खेमराज सुंद्रियाल ने केवल अपनी कला तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि स्थानीय बुनकरों को प्रशिक्षण देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम किया। कहा जाता है कि उन्होंने हजारों लोगों को हैंडलूम की ट्रेनिंग दी और कई परिवारों के लिए रोजगार के अवसर तैयार किए। इससे भारतीय हस्तशिल्प को वैश्विक पहचान भी मिली। ग्रामीणों के अनुसार, खेमराज सुंद्रियाल को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए पहले भी तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के कार्यकाल में सम्मानित किया जा चुका है। अब पद्मश्री सम्मान की घोषणा ने उनके योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत पहचान दे दी है।

बचपन से थे अनुशासित और जिम्मेदार

गांव में रहने वाली उनकी लगभग 80 वर्षीय भाभी रमा देवी भावुक होकर बताती हैं कि खेमराज सुंद्रियाल बचपन से ही मेहनती, अनुशासित और जिम्मेदार थे।परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी, इसलिए उन्हें खेती-बाड़ी के साथ-साथ घर के कई काम भी खुद करने पड़ते थे। उन्होंने कठिन हालातों में भी कभी हार नहीं मानी। ग्रामीणों का कहना है कि खेमराज सुंद्रियाल समय मिलने पर गांव के बच्चों को पढ़ाते भी थे। वे बच्चों के लिए एक सख्त लेकिन मार्गदर्शक शिक्षक की तरह रहे। उनका समय पालन, मेहनत और अनुशासन आज भी गांव के कई लोगों की जीवनशैली में दिखाई देता है।

राष्ट्रीय स्तर पर बनी गांव की पहचान

ग्रामीणों ने खुशी जताते हुए कहा कि गांव से पद्मश्री सम्मान मिलना पूरे क्षेत्र के लिए गौरव की बात है। इससे सुमाड़ी गांव की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर बनी है और युवाओं को यह संदेश मिला है कि सीमित संसाधनों में भी मेहनत से बड़ा मुकाम हासिल किया जा सकता है। ग्रामीणों ने इसे गांव के लिए ऐतिहासिक क्षण बताया। उन्होंने कहा कि खेमराज सुंद्रियाल को पद्मश्री मिलना वर्षों की साधना और योगदान का परिणाम है। ग्राम प्रधान ने उम्मीद जताई कि भविष्य में वे गांव आकर अपने अनुभव साझा करेंगे और युवाओं को स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रेरित करेंगे।


View More Latest Uttarakhand News
View More Trending News
  • More News...

News Home