गढ़वाल: अवैध खनन से कराह रही अलकनंदा, विलुप्ति की कगार पर 'श्रीनगर की गंगा'
श्रीनगर गढ़वाल में अलकनंदा नदी अवैध खनन से गंभीर संकट में है। जेसीबी और ट्रकों की खुदाई से नदी का अस्तित्व खतरे में, प्रशासन की चुप्पी पर उठे सवाल।
Feb 5 2026 12:45PM, Writer:राज्य समीक्षा डेस्क
जिस 'श्रीनगर की गंगा' का जिक्र गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी के गीतों में भी है, श्रीनगर गढ़वाल में वो अलकनंदा नदी अवैध खनन के कारण विलुप्ति के गंभीर संकट से गुजर रही है। दिन-रात चल रही जेसीबी और ट्रकों की खुदाई से नदी का प्राकृतिक स्वरूप नष्ट हो चुका है। इससे पर्यावरण, जलस्तर और स्थानीय लोगों के जीवन पर गहरा असर पड़ रहा है, जबकि प्रशासन की चुप्पी चिंता बढ़ा रही है।
Illegal Mining Threatens Alaknanda River Existence in Srinagar Garhwal
उत्तराखंड के श्रीनगर गढ़वाल क्षेत्र में बहने वाली अलकनंदा नदी आज अपने अस्तित्व के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। कभी जहां अविरल और निर्मल जलधारा बहती थी, वहां अब सूखी रेत, गड्ढे और टूटी हुई नदी की सतह नजर आती है। अवैध खनन ने नदी के प्राकृतिक स्वरूप को पूरी तरह बदलकर रख दिया है।
दिन-रात खुदाई से खोखली हो रही नदी
स्थानीय लोगों के अनुसार, बीते कई महीनों से अलकनंदा नदी में लगातार जेसीबी मशीनों और भारी ट्रकों के जरिए खुदाई की जा रही है। रेत और बजरी निकालने के इस अवैध कारोबार ने नदी की गहराई और प्रवाह दोनों को प्रभावित किया है। नतीजा यह है कि नदी धीरे-धीरे भीतर से खोखली होती जा रही है।
प्राकृतिक स्वरूप नष्ट होना पर्यावरणीय संकट
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अवैध खनन के कारण नदी का जलस्तर लगातार गिर रहा है जिससे आसपास का पर्यावरण असंतुलित हो रहा है, जैव विविधता पर खतरा मंडरा रहा है। जलीय जीवों का अस्तित्व संकट में है और विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले वर्षों में अलकनंदा का अस्तित्व ही समाप्त हो सकता है।
स्थानीय लोगों की आजीविका और भविष्य खतरे में
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अलकनंदा नदी पर आश्रित हजारों परिवारों की आजीविका भी इस संकट से प्रभावित हो रही है। मछली पालन, पर्यटन और छोटे व्यापार से जुड़े लोग आर्थिक परेशानी झेल रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि नदी सूखने से खेती और पीने के पानी की समस्या भी बढ़ रही है।
सरकार और प्रशासन की चुप्पी पर उठे सवाल
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सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस गंभीर स्थिति के बावजूद राज्य सरकार और संबंधित अधिकारी लगभग मौन हैं। नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, लेकिन प्रभावी कार्रवाई नहीं हो रही। इससे प्रशासन की कार्यशैली और इच्छाशक्ति पर सवाल खड़े हो रहे हैं। पर्यावरणीय संतुलन सरकार की बड़ी जिम्मेदारी है।
क्या बच पाएगी अलकनंदा?
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यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में अलकनंदा नदी केवल इतिहास के पन्नों में सिमटकर रह सकती है।