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उत्तराखंड: अफसरशाही की बड़ी लापरवाही, बिना मंत्री-सचिव हस्ताक्षर के कैबिनेट प्रस्ताव.. आदेशों की भी अनदेखी

उत्तराखंड शासन में कैबिनेट प्रस्तावों को लेकर गंभीर लापरवाही सामने आई है। बिना हस्ताक्षर, बिना कानूनी परीक्षण और बिना विभागीय सहमति के प्रस्ताव मंत्रिमंडल तक पहुंच रहे हैं। मुख्य सचिव आनंद वर्धन ने दोबारा सख्त निर्देश जारी किए हैं...
May 16 2026 11:57AM, Writer:राज्य समीक्षा डेस्क

उत्तराखंड शासन में मंत्रिमंडल के सामने रखे जाने वाले प्रस्तावों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। स्थिति यह है कि कैबिनेट जैसे बेहद महत्वपूर्ण मामलों में भी विभागीय स्तर पर लगातार लापरवाही सामने आ रही है। हैरानी की बात यह है कि मुख्य सचिव स्तर से कई बार निर्देश जारी होने के बावजूद भी शासन के विभिन्न विभागों में सुधार होता दिखाई नहीं दे रहा है। अब एक बार फिर मुख्य सचिव कार्यालय को इस पूरे मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा है।

Serious Lapses Found in Uttarakhand Cabinet Proposal Process

उत्तराखंड शासन में फाइलों के निस्तारण और निर्णय प्रक्रिया को लेकर पहले भी कई बार सवाल उठते रहे हैं। लेकिन इस बार मामला सीधे मंत्रिमंडल के सामने रखे जाने वाले प्रस्तावों से जुड़ा है। मंत्रिमंडल में आने वाले प्रस्ताव राज्य सरकार की नीतियों और बड़े फैसलों का आधार होते हैं। ऐसे प्रस्तावों पर मुख्यमंत्री समेत पूरा मंत्रिमंडल समय देता है। इसके बावजूद विभागीय अधिकारी इन प्रस्तावों को तैयार करने में गंभीरता नहीं दिखा रहे हैं।

साल भर पहले भी चिट्ठी लिख चुके हैं मुख्य सचिव

मुख्य सचिव आनंद वर्धन ने पिछले साल भी इस संबंध में शासन के वरिष्ठ अधिकारियों को पत्र लिखा था। 19 जून 2025 को जारी किए गए पत्र में स्पष्ट तौर पर कहा गया था कि कई विभाग कैबिनेट बैठक से ठीक पहले प्रस्ताव तैयार कर उन्हें परामर्श विभागों को भेज रहे हैं। इससे उन प्रस्तावों का समुचित परीक्षण नहीं हो पा रहा है और कई त्रुटियां अंतिम समय तक बनी रह जाती हैं। मुख्य सचिव ने उस समय यह भी स्पष्ट किया था कि मंत्रिमंडल की बैठक से कम से कम सात दिन पहले प्रस्ताव मंत्री परिषद विभाग को उपलब्ध करा दिए जाने चाहिए, ताकि उनका समय रहते परीक्षण किया जा सके और आवश्यक सुधार किए जा सकें। इसके पीछे मकसद यही था कि मंत्रिमंडल के सामने त्रुटिरहित और पूरी तरह परीक्षण किए गए प्रस्ताव ही रखे जाएं।

मुख्य सचिव ने फिर लिखा पत्र

लेकिन अब सामने आ रही जानकारी यह बताती है कि मुख्य सचिव के निर्देशों का असर विभागों पर नहीं दिखाई दे रहा है। यही वजह है कि मुख्य सचिव को एक बार फिर शासन के तमाम वरिष्ठ अधिकारियों को पत्र लिखना पड़ा है। इस नए पत्र में प्रस्तावों से जुड़ी दस प्रमुख कमियों का उल्लेख करते हुए उन्हें तत्काल दूर करने के निर्देश दिए गए हैं।
सबसे गंभीर बात यह है कि कई प्रस्ताव बिना मंत्री और विभागीय सचिव के हस्ताक्षर के ही मंत्रिमंडल के लिए भेजे जा रहे हैं। यानी जिन प्रस्तावों पर सरकार के बड़े फैसले होने हैं, वे बिना सक्षम अधिकारियों की औपचारिक स्वीकृति के आगे बढ़ाए जा रहे हैं। यह प्रशासनिक प्रक्रिया की गंभीर अनदेखी मानी जा रही है। आगे पढ़िए..

इसके अलावा विभागों द्वारा मंत्रिमंडल के लिए तैयार किए गए प्रस्ताव समय पर कैबिनेट पोर्टल पर अपलोड नहीं किए जा रहे हैं। इससे संबंधित विभागों और परामर्शीय इकाइयों को पर्याप्त समय नहीं मिल पाता। नतीजा यह होता है कि कई प्रस्ताव अधूरे परीक्षण के साथ ही मंत्रिमंडल के सामने पहुंच जाते हैं। मामला केवल हस्ताक्षर या समय सीमा तक सीमित नहीं है। कई ऐसे प्रस्ताव भी सामने आए हैं, जिन्हें बिना परामर्शीय विभागों की सहमति के ही आगे बढ़ाया गया। शासन व्यवस्था में किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय से पहले संबंधित विभागों की राय लेना अनिवार्य माना जाता है, लेकिन यहां इस प्रक्रिया की भी अनदेखी की जा रही है।

कानूनी पहलुओं की भी हो रही अनदेखी

इतना ही नहीं, कई प्रस्तावों के साथ संलग्न नियमावली, विधेयक और अन्य दस्तावेज विधिक परीक्षण के बिना ही प्रस्तुत किए जा रहे हैं। यानी कानूनी दृष्टि से उनकी समीक्षा तक पूरी नहीं हो रही। यदि ऐसे प्रस्तावों पर निर्णय हो जाए तो आगे चलकर कानूनी विवाद की स्थिति भी पैदा हो सकती है। मुख्य सचिव द्वारा उठाई गई आपत्तियों में यह बात भी शामिल है कि कई मंत्रिमंडलीय टिप्पणियों में विषय स्पष्ट नहीं होता। कुछ मामलों में प्रस्ताव का उद्देश्य और उसका प्रभाव तक साफ तरीके से उल्लेखित नहीं किए जाते। इससे मंत्रिमंडल के सदस्यों को निर्णय लेने में कठिनाई हो सकती है।

मंत्रियों की नाराजगी का भी नहीं हो रहा असर

मुख्यमंत्री और मंत्रियों द्वारा भी कई बार त्रुटिपूर्ण प्रस्तावों पर नाराजगी जताई जा चुकी है। मंत्रिमंडल की बैठकों में ऐसे मामलों पर आपत्ति दर्ज कर अधिकारियों को प्रक्रिया में सुधार के निर्देश दिए गए थे। बावजूद इसके विभागीय स्तर पर लापरवाही जारी रहना शासन के भीतर समन्वय और जवाबदेही दोनों पर सवाल खड़े कर रहा है।

अधूरे प्रस्ताव शासन की साख पर लगा रहे बट्टा

कैबिनेट में जाने वाले प्रस्ताव राज्य की प्रशासनिक दिशा तय करते हैं। यदि इन्हीं प्रस्तावों की तैयारी में गंभीरता नहीं बरती जाएगी, तो इससे न केवल निर्णय प्रक्रिया प्रभावित होगी, बल्कि शासन की विश्वसनीयता पर also असर पड़ेगा। अब देखना होगा कि मुख्य सचिव के ताजा निर्देशों के बाद विभागीय अधिकारियों की कार्यशैली में कोई बदलाव आता है, या फिर पहले की तरह आदेश केवल कागजों तक ही सीमित रह जाते हैं।


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