image: Ancient structure discovered during excavation in Uttarakhand

उत्तराखंड: जमीन के नीचे छिपा था सदियों पुराना राज! खुदाई में मिली रहस्यमयी गुप्तकालीन संरचना

ऊधम सिंह नगर स्थित ऐतिहासिक गोविषाण टीले में खुदाई के दौरान ईंटों से बनी करीब 10-11 फीट गहरी गोलाकार संरचना मिली है, जिसे प्रारंभिक तौर पर कुएं जैसा माना जा रहा है। ASI के अनुसार इसकी निर्माण शैली गुप्तकाल से जुड़ने के संकेत देती है
Sep 16 2026 12:22PM, Writer:राज्य समीक्षा डेस्क

उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर जिले के काशीपुर में स्थित ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व वाले गोविषाण टीले पर चल रही पुरातात्विक खुदाई से इतिहास के नए रहस्य सामने आने की उम्मीद जगी है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की खुदाई के दौरान यहां ईंटों से बनी एक गोलाकार संरचना मिली है।

Ancient structure discovered during excavation in Uttarakhand

प्रारंभिक निरीक्षण में यह संरचना कुएं जैसी दिखाई दे रही है और इसकी गहराई करीब 10 से 11 फीट बताई जा रही है। ASI के अधिकारियों के अनुसार, निर्माण शैली को देखते हुए इसके गुप्तकालीन होने की संभावना है। हालांकि, अंतिम निष्कर्ष विस्तृत खुदाई और वैज्ञानिक अध्ययन के बाद ही सामने आएगा।

16 जुलाई से शुरू हुई थी खुदाई

गोविषाण टीले के नीचे दबे पुरातात्विक अवशेषों का पता लगाने और यहां के प्राचीन सांस्कृतिक एवं संरचनात्मक क्रम को समझने के उद्देश्य से खुदाई के निर्देश दिए गए थे। इसके बाद ASI देहरादून मंडल ने कुमाऊं आयुक्त दीपक रावत की मौजूदगी में 16 जुलाई से यहां उत्खनन शुरू किया। शुरुआती खुदाई के दौरान ईंटों से निर्मित गोलाकार संरचना सामने आई। इसकी गहराई लगभग 10-11 फीट और व्यास करीब 5 से 7 फीट बताया गया है। संरचना का कुछ हिस्सा अभी भी मिट्टी में दबा हुआ है, इसलिए इसका वास्तविक आकार और स्वरूप फिलहाल पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

गुप्तकाल से जुड़ने के मिले शुरुआती संकेत

ASI देहरादून के अधीक्षण पुरातत्वविद डा. एमसी जोशी के अनुसार, संरचना का प्रारंभिक अवलोकन इसे गुप्तकाल से जोड़ने के संकेत देता है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि केवल शुरुआती निरीक्षण के आधार पर किसी संरचना का काल निश्चित नहीं किया जा सकता। इसके लिए आगे की खुदाई, मिट्टी की परतों का अध्ययन, निर्माण शैली और भविष्य में मिलने वाली पुरातात्विक सामग्री महत्वपूर्ण होगी।

अभी नहीं मिली ऐसी कलाकृति जो काल स्पष्ट कर सके

खुदाई में अभी तक ऐसी कोई विशिष्ट कलाकृति या शिलापट नहीं मिला है, जिसके आधार पर इस संरचना को निश्चित रूप से किसी विशेष काल से जोड़ा जा सके। आगे पढ़िए..

पुरातत्वविद निर्माण में इस्तेमाल हुई ईंटों और अन्य सामग्री, मिट्टी की अलग-अलग परतों तथा आगे मिलने वाले अवशेषों का अध्ययन करेंगे। इन्हीं वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर संरचना की वास्तविक उम्र और उपयोग को लेकर निष्कर्ष निकाला जाएगा।

बारिश के कारण फिलहाल रुकी है खुदाई

मानसून के कारण पिछले करीब डेढ़ महीने से खुदाई का काम रोक दिया गया है। बारिश और जलभराव के कारण मिट्टी धंसने तथा संरचना को नुकसान पहुंचने की आशंका को देखते हुए इसे सुरक्षित कर दिया गया है। संरचना को पहले पन्नी से कवर किया गया और फिर मिट्टी से ढक दिया गया है। अक्टूबर में खुदाई दोबारा शुरू होने की संभावना है। काम शुरू होने पर पन्नी और मिट्टी हटाकर उत्खनन को आगे बढ़ाया जाएगा।

90 एकड़ में फैला है गोविषाण टीला

गोविषाण टीले को द्रोण का किला भी कहा जाता है। यह संरक्षित पुरातात्विक क्षेत्र करीब 90 एकड़ में फैला हुआ है। आजादी के बाद यहां कई चरणों में खुदाई हो चुकी है। इन उत्खननों में छठी और सातवीं शताब्दी से जुड़ी किलेनुमा दीवारें, तांबे के सिक्के, मूर्तियां और मिट्टी के बर्तन समेत कई पुरातात्विक अवशेष मिलने की जानकारी है।

अलेक्जेंडर कनिंघम ने भी किया था दौरा

गोविषाण क्षेत्र का पुरातात्विक महत्व नया नहीं है। 1862-63 में तत्कालीन पुरातत्व सर्वेक्षक सर अलेक्जेंडर कनिंघम ने यहां का दौरा किया था और पुरातात्विक टीलों की पहचान की थी। इसके बाद 1963-64 में ASI की खुदाई के दौरान यहां गुप्तकालीन किले और अन्य प्राचीन संरचनाओं के अवशेष सामने आए थे।

ह्वेनसांग ने भी किया था गोविषाण का उल्लेख

गोविषाण का उल्लेख ऐतिहासिक यात्रावृत्तांतों में भी मिलता है। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 636 ईस्वी के आसपास इस क्षेत्र का दौरा किया था। उसके विवरण में गोविषाण को एक विस्तृत नगर के रूप में बताया गया है। उसके अनुसार, यहां बगीचे, तालाब, मछली कुंड और बौद्ध मठ मौजूद थे। ह्वेनसांग ने यहां करीब 200 फीट ऊंचे अशोक स्तूप और दो अन्य स्तूपों का भी उल्लेख किया था।

पौराणिक मान्यताओं से भी जुड़ा है क्षेत्र

गोविषाण का संबंध केवल पुरातात्विक इतिहास से ही नहीं, बल्कि पौराणिक परंपराओं से भी जोड़ा जाता है। स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, महाभारत काल में इस क्षेत्र को उज्जैनी नगरी के नाम से जाना जाता था। छठी शताब्दी में यह क्षेत्र कुनिंदा राजवंश का प्रमुख नगर माना जाता है।

आगे की खुदाई से खुलेंगे नए राज

फिलहाल मिली गोलाकार संरचना को लेकर पुरातत्वविदों में उत्सुकता है। हालांकि, ASI अधिकारियों का कहना है कि किसी भी पुरातात्विक खोज के बारे में अंतिम निष्कर्ष निकालने से पहले वैज्ञानिक प्रमाण और विस्तृत अध्ययन जरूरी है। अक्टूबर में खुदाई दोबारा शुरू होने के बाद इस संरचना के आसपास और नीचे से क्या अवशेष सामने आते हैं, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। इससे गोविषाण टीले के प्राचीन इतिहास और यहां विकसित हुई सभ्यता के बारे में नई जानकारी मिलने की संभावना है।


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