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उत्तराखंड में ही क्यूं मनाई जाती है इगास बग्वाल, जानिए पहाड़ के भड़ माधो सिंह भंडारी की वीरगाथा

उत्तराखंड में हर साल दीपावली के 11 दिन बाद एक और दिवाली मनाई जाती है, जिसे इगास कहा जाता है। जानिए क्यों मनाई जाती है उत्तराखंड में इगास बग्वाल?
Nov 1 2025 12:28PM, Writer:राज्य समीक्षा डेस्क

उत्तराखंड में कार्तिक मास की एकादशी यानि दीपावली के 11वें दिन बाद इगास का त्योहार मनाया जाता है। कई लोग इगास त्योहार को बूढ़ी दिवाली भी कहते हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सभी प्रदेश वासियों को इस खास त्योहार इगास की शुभकामनाएं दी हैं। जानिए क्यों मनाई जाती है उत्तराखंड में इगास बग्वाल?

The history of Igas celebrated in Uttarakhand

उत्तराखंड में हर साल दीपावली के 11 दिन बाद एक और दिवाली मनाई जाती है, जिसे इगास कहा जाता है। पहाड़ की लोक संस्कृति से जुड़े इगास पर्व के दिन मीठे पकवान बनाए जाते हैं और देवी-देवताओं की पूजा की जाती है. इस दिन साथ ही गाय और बैलों की पूजा की जाती है, भैलो घुमाया जाता है. पौराणिक लोक कथाओं के अनुसार इगास पर्व मनाने की एक सबसे प्रचलित एक कहानी है. बताया जाता है कि सोहलवीं सदी में लगभग 1603 - 1627 ई० के दौरान गढ़वाल राज्य की राजधानी श्रीनगर में महाराजा महीपत शाह राज्यशासन की जिम्मेदारी सम्भाले हुए थे। उस अवधि में गढ़वाल राज्य के दो प्रमुख सेनानायक परम पराक्रमी वीरयोद्धा माधोसिंह भंडारी और महान पराक्रमी वीरयोद्धा लोदी रिखोला गढ़वाली सेना की कमान संभाल रहे थे।

शौकू का आक्रमण रोकने की जिम्मेदारी

जब वीरभड़ लोधी रिखोला, गढ़वाल राज्य की दक्षिण - पूर्वी सीमा पर भाबर एवं कालागढ़ क्षेत्र में बहादुरी के साथ आक्रमणकारियों से लोहा ले रहे थे, तो उत्तरी सीमा पर भोटन्त देश (तिब्बत) के आक्रमणकारी निरन्तर अशान्ति पैदा कर रहे थे। यकायक भोटन्त देश के राजा शौका (शौकू) ने गढ़वाल राज्य पर आक्रमण करने की घोषणा कर दी। ऐसे में महाराजा महीपत शाह ने राज्य के प्रमुख सेनापति वीरभड़ माधो सिंह भंडारी को गढ़वाली सेना के साथ भोटन्त देश तिब्बत की सीमा पर शौकू का आक्रमण रोकने की जिम्मेदारी सौंपी।

गढ़वाल-तिब्बत सीमा पर मुण्डारा

वीरभड़ माधो सिंह भंडारी अपने गढ़वाली योद्धाओं को साथ कई खतरनाक विकट रास्तों पर महीने भर की लम्बी एवं थकाऊ यात्रा के बाद तिब्बत की सीमा पर पहुंचे। जिसके बाद तिब्बती सेना के साथ सीमा पर लगभग छ: माह तक भयानक युद्ध चलता रहा और आखिरकार माधो सिंह भंडारी के युद्ध कौशल एवं रणनीति के सम्मुख तिब्बती सेना को पीठ दिखाकर भागना पड़ा। माधोसिंह भंडारी ने तिब्बती सेना को सीमा के अंदर तक खदेड़ने के पश्चात् भोटन्त प्रान्तपर विजय पताका फहरा दी। इसके साथ ही गढ़वाल और तिब्बत की सीमा पर पत्थरों की सीमा रेखा (मुण्डारा) का निर्माण भी किया गया। वह पाषाण रेखा आज भी तिब्बत और गढ़वाल की सीमा को दो भागों में विभाजित करती है।

माधोसिंह भंडारी के स्वागत में मनाई गई इगास

विजय पताका फहराने के बाद कठिन रास्ते से राजधानी श्रीनगर तक पहुंचने में लंबा समय लगना स्वाभाविक ही था। ऐसे में वीर माधो सिंह भंडारी और उनकी सेना की सकुशल होने का समाचार न मिलने के कारण महीपत शाहजी महाराज ने राज्यभर में दीवाली नहीं मनाने का फरमान जारी कर दिया। आखिरकार दीपावली के 11वें दिन बाद कार्तिक मास की एकादशी (इगास) के दिन जब वीर सेनापति माधोसिंह भंडारी के पहुंचने की सूचना प्राप्त हुई। एकादशी के दिन महाराजा महीपत शाह ने वीर सेनापति सहित जीवित बचकर आए सैनिकों के सम्मान में संपूर्ण गढ़वाल प्रांत में प्रकाश पर्व मनाने ऐलान किया। संपूर्ण गढ़वाल वासियों ने सेनापति वीरभड़ माधो सिंह भंडारी का स्वागत दौळी के छुल्ले चीड़ अथवा अन्य जलनशील पेड़ों की लड़कियां रस्सी से बांध कर जलाने के पश्चात् झूम-झूम नाचते हुए किया। महाराजा यह भी ऐलान किया कि आज से दिवाली के 11वें दिन हर साल वीरभड़ सेनापति माधोसिंह भंडारी की वीरता के लिए समर्पित इगास बग्बाळ मनाई जाएगी।

इगास के दिन सार्वजनिक छुट्टी

आज दीपावली के 11वें दिन यानि 1 नवम्बर को इगास के इस महापर्व पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सभी प्रदेशवासियों को शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने कहा है कि देवभूमि उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति और परंपराएं हमारी पहचान हैं। सरकार से इस खास पर्व पर सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया है ताकि लोग अपनी जड़ों से जुड़ सकें और अपने परिवार के साथ इस लोकपर्व को परंपरागत रीति से मना सकें।


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