Uttarakhand: गणकोट गांव के लाल की नम आंखों से विदाई, ताबूत से लिपटकर रोई पत्नी; नम हुई हर आंख
Pithoragarh News: सिक्किम में हिमस्खलन में शहीद हुए Vikas Kumar का पार्थिव शरीर पांच दिन बाद पिथौरागढ़ पहुंचा। पूरे सैन्य सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया, जहां हजारों लोगों ने नम आंखों से उन्हें श्रद्धांजलि दी।
Apr 3 2026 9:22PM, Writer:राज्य समीक्षा डेस्क
Pithoragarh के गणकोट गांव निवासी लांस नायक Vikas Kumar का पार्थिव शरीर पांच दिन बाद उनके पैतृक आवास पहुंचा। सिक्किम में हिमस्खलन में शहीद हुए जवान को पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई।
Martyr Lance Naik Vikas Kumar cremated at Rameshwar Ghat
दरअसल शुक्रवार सुबह शहीद का पार्थिव शरीर हवाई मार्ग से नैनी-सैनी एयरपोर्ट लाया गया। वहां से सेना के वाहन के जरिए उन्हें उनके गांव गणकोट पहुंचाया गया। जैसे ही पार्थिव शरीर गांव पहुंचा, पूरा माहौल गमगीन हो गया। शहीद विकास कुमार की पत्नी उनका शरीर गांव पहुंचने तक रास्ते में खड़ी रही। गांव के लोगों उन्हें सांत्वना देते रहे, लेकिन अमर शहीद विकास का पार्थिव शरीर जैसे ही घर पहुंचा उनकी पत्नी फूट फूट कर रोने लगी। अंतिम दर्शनों के लिए जांबाज का ताबूत खोला गया तो उनकी पत्नी रोते हुए बार-बार कहती रही कि इन्हें अस्पताल ले चलो।
मां-पिता का भी रो-रोकर बुरा हाल
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बेटे को तिरंगा में लिपटा देख मां और पिता का भी रो-रोकर बुरा हाल था। वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम थीं और हर कोई वीर सपूत को श्रद्धांजलि दे रहा था। जिलाधिकारी Ashish Kumar Bhatgain समेत कई जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों ने शहीद को श्रद्धांजलि दी। आसपास के गांवों से भी हजारों लोग अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे और नम आंखों से विदाई दी।
सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार
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गांव में अंतिम दर्शन के बाद शहीद की शव यात्रा करीब 40 किलोमीटर दूर रामेश्वर घाट के लिए निकली। पूरे रास्ते “भारत माता की जय” और “विकास अमर रहे” जैसे नारों से वातावरण गूंज उठा। रामेश्वर घाट पर पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। शहीद के बड़े भाई नीरज कुमार ने चिता को मुखाग्नि दी और कहा कि उन्हें अपने भाई के बलिदान पर गर्व है।
बेटे के जन्मदिन पर घर लौटने का किया था वादा
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Vikas Kumar ने चार महीने पहले घर आकर अपने बेटे के पहले जन्मदिन पर जून में फिर लौटने का वादा किया था। लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था—वह वादा पूरा करने के बजाय तिरंगे में लिपटकर घर लौटे। उनका 10 माह का मासूम बेटा अभी इस बलिदान से अनजान है। 29 मार्च को शहीद होने के बाद परिवार को पार्थिव शरीर के लिए पांच दिनों तक इंतजार करना पड़ा। इस दौरान गांव में मातम पसरा रहा और हर पल परिवार के लिए भारी गुजर रहा था। लांस नायक Vikas Kumar का यह बलिदान देशभक्ति और साहस की मिसाल है। उनका नाम हमेशा सम्मान के साथ लिया जाएगा और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।