image: Suraj Nayal left cricket and started farming in the village

उत्तराखंड के इस क्रिकेटर ने गांंव में शुरू की खेती, पेश की रिवर्स माइग्रेशन की मिसाल

उत्तराखंड के पूर्व क्रिकेटर सूरज नयाल ने क्रिकेट छोड़ खेती-किसानी को अपनाकर युवाओं के लिए नई मिसाल कायम की है। उन्होंने अपने भाई के साथ मिलकर गांव में कीवी, सेब और जैविक खेती शुरू की...
May 18 2026 5:10PM, Writer:राज्य समीक्षा डेस्क

उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के हवालबाग ब्लॉक स्थित मैगड़ी गांव (तोक दूणी) के रहने वाले सूरज नयाल ने युवाओं के लिए प्रेरणा की नई मिसाल पेश की है। कर्नल सीके नायडू ट्रॉफी (अंडर-23/25) में उत्तराखंड का प्रतिनिधित्व कर चुके सूरज ने क्रिकेट की दुनिया से हटकर खेती-किसानी का रास्ता चुना और अपने गांव लौटकर “रिवर्स माइग्रेशन” की शुरुआत की।पलायन की मार झेल रहे इस गांव में आज केवल 17 परिवार ही रह गए हैं। गांव अभी भी मूलभूत सुविधाओं के अभाव से जूझ रहा है, लेकिन सूरज और उनके भाई संतोष नयाल ने गांव की तस्वीर बदलने का संकल्प लिया। दोनों भाइयों ने वर्षों से खाली पड़ी कृषि भूमि को फिर से खेती योग्य बनाने के लिए कड़ी मेहनत की। करीब पांच से छह महीने तक लगातार मेहनत करने के बाद उन्होंने खेतों को तैयार किया और आधुनिक बागवानी की शुरुआत की।
उद्यान विभाग की “कीवी मिशन” योजना के तहत 8 नाली भूमि में 50 कीवी के पौधे लगाए गए हैं। इसके साथ ही “एप्पल मिशन” के अंतर्गत 10 नाली भूमि में 500 सेब के पौधों का रोपण किया गया है। सेब और कीवी के अलावा दोनों भाई जैविक सब्जियों और जापानी फल पर्सिमन का भी उत्पादन कर रहे हैं। उनकी जैविक सब्जियों से सालाना लगभग 50 हजार रुपये की आय हो रही है। इस पूरे स्वरोजगार प्रोजेक्ट को शुरू करने में लगभग 25 से 30 लाख रुपये का खर्च आया, लेकिन अब यह पहल गांव में रोजगार और आत्मनिर्भरता का बड़ा माध्यम बनती जा रही है। आगे पढ़िए..

सूरज नयाल और उनके भाई की इस पहल से न केवल बंजर जमीन को नया जीवन मिला है, बल्कि गांव के 20 से अधिक लोगों को रोजगार भी मिला है। ग्रामीण क्षेत्र में यह पहल अब पलायन रोकने और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का सकारात्मक उदाहरण बन चुकी है। गांव के लोग भी अब खेती और बागवानी की ओर फिर से रुचि दिखाने लगे हैं।
सूरज नयाल ने बताया कि पहाड़ों में खेती करना आसान नहीं है। पिछले दो वर्षों से उन्होंने सेब की फसल पर लगातार मेहनत की, लेकिन बंदर और लंगूर जैसे जंगली जानवरों ने फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया। उन्होंने कहा कि पहाड़ों में खेती के सामने जंगली जानवरों से फसल बचाना सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन गया है।

पिता से मिली अनुशासन और मेहनत की प्रेरणा

सूरज का बचपन दिल्ली में बीता और उनकी पूरी शिक्षा भी वहीं हुई। उनके पिता बालम सिंह पूर्व सैनिक हैं, जिनसे उन्हें अनुशासन, मेहनत और देशसेवा की प्रेरणा मिली। यही कारण है कि क्रिकेट और खेती दोनों क्षेत्रों में उन्होंने मेहनत और लगन के दम पर अपनी अलग पहचान बनाई।

क्रिकेट में भी हासिल किए कई सम्मान

सूरज नयाल ने वर्ष 2008 से क्रिकेट खेलना शुरू किया था। उन्होंने स्कूल नेशनल स्तर पर उत्तराखंड और दिल्ली दोनों का प्रतिनिधित्व किया। अपनी प्रतिभा के दम पर उन्होंने तीन गोल्ड मेडल भी हासिल किए। क्रिकेट में सफलता पाने के बाद अब वह खेती के जरिए पहाड़ों में नई उम्मीद बो रहे हैं।
आज जब बड़ी संख्या में युवा रोजगार के लिए गांव छोड़ रहे हैं, ऐसे समय में सूरज नयाल की कहानी यह साबित करती है कि मेहनत और नई सोच के साथ खेती भी एक सफल और सम्मानजनक करियर बन सकती है। उनकी यह पहल पहाड़ों में “रिवर्स माइग्रेशन” और स्वरोजगार का प्रेरणादायक उदाहरण बन चुकी है।


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