image: Uttarakhand High Court Upholds Divorce in Mental Cruelty Case

Uttarakhand High Court: सहकर्मियों के सामने अपमान को कोर्ट ने माना मानसिक क्रूरता, दो वकीलों का तलाक बरकरार

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने दो वकीलों के तलाक के मामले में फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि लगातार अपमान और पेशेवर व निजी मामलों में दबाव का संचयी प्रभाव मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आया।
Sep 21 2026 12:32PM, Writer:राज्य समीक्षा डेस्क

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने दो वकीलों के वैवाहिक विवाद में देहरादून फैमिली कोर्ट के 5 अप्रैल 2024 के तलाक के फैसले को बरकरार रखा है। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की डिवीजन बेंच ने पत्नी की पहली अपील खारिज करते हुए माना कि पति मानसिक क्रूरता का आधार साबित करने में सफल रहा। कोर्ट ने पति को नाबालिग बेटी की देखभाल और शिक्षा के लिए 70 लाख रुपये तथा पत्नी को 40 लाख रुपये स्थायी गुजारा-भत्ता देने का भी निर्देश दिया।

Uttarakhand High Court Upholds Divorce in Mental Cruelty Case

यह मामला ऐसे दंपती से जुड़ा है, जो दोनों कानूनी पेशे से जुड़े हैं। पत्नी पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में पूर्व एडिशनल एडवोकेट जनरल रह चुकी हैं, जबकि पति दिल्ली की एक कॉरपोरेट लॉ फर्म से जुड़े वकील हैं। दोनों का विवाह 3 मार्च 2014 को हुआ था और सितंबर 2015 में उनकी बेटी का जन्म हुआ। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, दोनों अप्रैल 2016 से अलग रह रहे हैं। नवंबर 2016 में पति ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक की याचिका दायर की थी। देहरादून फैमिली कोर्ट ने 5 अप्रैल 2024 को तलाक मंजूर कर दिया था। इसके बाद पत्नी ने हाईकोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी।

पत्नी पर लगाए गए आरोपों पर कोर्ट ने की सुनवाई

मामले की सुनवाई के दौरान पति की ओर से आरोप लगाया गया कि पत्नी ने कई मौकों पर उनके, उनके माता-पिता, रिश्तेदारों और परिचितों के साथ दुर्व्यवहार किया। यह भी आरोप था कि पत्नी पति पर अपनी कॉरपोरेट लॉ की नौकरी छोड़कर चंडीगढ़ जाने का दबाव डालती थीं और उन्हें अपने माता-पिता से अलग करने का प्रयास करती थीं। पति की ओर से खुद के अलावा उनके माता-पिता और एक वकील को गवाह के तौर पर पेश किया गया। वहीं पत्नी ने स्वयं को गवाह के रूप में पेश किया। हाईकोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों और दोनों पक्षों की दलीलों के आधार पर मामले की समीक्षा की।

'सिर्फ वैचारिक मतभेद' वाली दलील नहीं मानी

पत्नी की ओर से दलील दी गई कि लगाए गए आरोप वैचारिक मतभेद और वैवाहिक जीवन में होने वाले सामान्य विवादों से आगे नहीं जाते। हालांकि, हाईकोर्ट ने मामले को केवल अलग-अलग घटनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि पूरे वैवाहिक संबंध के दौरान सामने आए आचरण के संचयी प्रभाव के रूप में देखा। कोर्ट ने कहा कि सामान्य मतभेद या कभी-कभार होने वाले झगड़े अपने आप में मानसिक क्रूरता नहीं होते, लेकिन इस मामले में लगातार अपमान, पेशेवर और निजी फैसलों को लेकर दबाव तथा परिवार से दूर करने के प्रयासों का संयुक्त प्रभाव अलग था।

सहकर्मियों के सामने अपमान को माना महत्वपूर्ण पहलू

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सहकर्मियों और परिचितों के सामने बार-बार अपमानित किए जाने का किसी व्यक्ति की गरिमा और मानसिक स्थिति पर गंभीर असर पड़ सकता है। अदालत ने विशेष रूप से यह तथ्य भी ध्यान में रखा कि दोनों पक्ष वकालत के पेशे से जुड़े हैं। कोर्ट के अनुसार, मामले में साबित आचरण सामान्य वैवाहिक मतभेदों की सीमा से आगे चला गया और मानसिक क्रूरता की कानूनी कसौटी पर खरा उतरा। इसी आधार पर फैमिली कोर्ट के तलाक के आदेश को बरकरार रखा गया।

बेटी की देखभाल मां के पास, पिता को मिलने का अधिकार

हाईकोर्ट ने नाबालिग बेटी की देखभाल और कस्टडी मां के पास रहने दी। साथ ही पिता के बेटी से मिलने और उसके जीवन में अभिभावकीय भागीदारी के अधिकार को भी मान्यता दी। इसके अलावा, पति को बेटी की देखभाल और शिक्षा के लिए 70 लाख रुपये की एकमुश्त राशि देने तथा पत्नी को 40 लाख रुपये स्थायी गुजारा-भत्ता देने का निर्देश दिया गया। यानी दोनों मदों में कुल राशि 1.10 करोड़ रुपये है।

करीब एक दशक से अलग रह रहा था दंपती

अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि दोनों पक्ष लंबे समय से अलग रह रहे हैं और 2016 से उनके बीच कानूनी विवाद चल रहा है। फैमिली कोर्ट के बाद हाईकोर्ट और अन्य स्तरों पर भी सुलह के प्रयास हुए, लेकिन वैवाहिक संबंध बहाल नहीं हो सका। हाईकोर्ट ने अंततः पत्नी की अपील खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट द्वारा विवाह समाप्त करने के फैसले को बरकरार रखा।


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