उत्तराखंड के जंगलों में तकनीक का नया दौर, AI की मदद से होगी पक्षियों की गिनती और संरक्षण
उत्तराखंड के नंधौर वन्यजीव अभयारण्य में पहली बार AI आधारित अकूस्टिक रिकॉर्डर लगाए गए हैं। एक सप्ताह के ट्रायल में 140 से अधिक पक्षी प्रजातियों की पहचान हुई, जिससे वन विभाग उत्साहित है।
Jun 17 2026 5:14PM, Writer:राज्य समीक्षा डेस्क
उत्तराखंड में वन्यजीव संरक्षण और जैव विविधता के क्षेत्र में तकनीक का नया दौर शुरू हो गया है। हल्द्वानी वन प्रभाग ने पहली बार नंधौर वन्यजीव अभयारण्य में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित अकूस्टिक रिकॉर्डर स्थापित किए हैं। इन हाईटेक उपकरणों की मदद से जंगलों में मौजूद पक्षियों की आवाज रिकॉर्ड कर उनकी प्रजातियों की पहचान की जा रही है।
AI Technology Helps Identify 140 Plus Bird Species in Uttarakhand Forests
वन विभाग के अनुसार शुरुआती ट्रायल के दौरान मात्र एक सप्ताह में 140 से अधिक पक्षी प्रजातियों की पहचान की गई है, जिससे विभाग बेहद उत्साहित है। यह पहल उत्तराखंड में वन्यजीव संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
क्या है अकूस्टिक रिकॉर्डर तकनीक?
अकूस्टिक रिकॉर्डर एक अत्याधुनिक उपकरण है जिसे जंगलों में पेड़ों पर स्थापित किया जाता है। यह डिवाइस 24 घंटे लगातार आसपास की प्राकृतिक ध्वनियों को रिकॉर्ड करता है। रिकॉर्ड की गई आवाजों का विश्लेषण आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सॉफ्टवेयर के जरिए किया जाता है। सॉफ्टवेयर पक्षियों की आवाज का मिलान अपने विशाल डेटाबेस से करता है और संबंधित प्रजाति की पहचान करता है। इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि पक्षियों को देखे बिना केवल उनकी चहचहाहट और ध्वनि के आधार पर उनकी मौजूदगी दर्ज की जा सकती है।
नंधौर अभयारण्य में सफल रहा पहला ट्रायल
हल्द्वानी वन प्रभाग के अधिकारियों के अनुसार नंधौर वन्यजीव अभयारण्य में इस तकनीक का एक सप्ताह का परीक्षण किया गया। ट्रायल के दौरान 140 से अधिक विभिन्न पक्षी प्रजातियों की पहचान हुई। यह परिणाम न केवल तकनीक की सफलता को दर्शाता है बल्कि नंधौर क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता को भी उजागर करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीक से उन दुर्लभ और कम दिखाई देने वाले पक्षियों की जानकारी भी प्राप्त की जा सकेगी, जिनकी पारंपरिक सर्वेक्षणों में पहचान करना मुश्किल होता है। आगे पढ़िए..
प्रवासी पक्षियों के संरक्षण में मिलेगी मदद
नंधौर वन्यजीव अभयारण्य देशी और विदेशी प्रवासी पक्षियों का महत्वपूर्ण आवास माना जाता है। हर वर्ष बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षी यहां पहुंचते हैं। AI आधारित निगरानी प्रणाली से उनके आगमन, व्यवहार और आवासीय पैटर्न का वैज्ञानिक रिकॉर्ड तैयार किया जा सकेगा। इससे संरक्षण योजनाओं को और अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिलेगी।
सभी रेंजों में लगाया जाएगा सिस्टम
हल्द्वानी वन प्रभाग के डीएफओ कुंदन कुमार ने बताया कि शुरुआती सफलता के बाद अब इस परियोजना का विस्तार किया जाएगा। वन विभाग की योजना हल्द्वानी वन प्रभाग की सभी पांच रेंजों में अकूस्टिक रिकॉर्डर लगाने की है। इससे पूरे क्षेत्र का एक व्यापक डिजिटल बर्ड डेटाबेस तैयार किया जा सकेगा।
पर्यावरणीय बदलावों को समझने में होगा उपयोग
विशेषज्ञों के अनुसार पक्षियों की संख्या और उनकी गतिविधियां किसी क्षेत्र के पर्यावरणीय स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण संकेत होती हैं। AI आधारित यह डेटा भविष्य में जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय बदलाव, जैव विविधता संरक्षण और वन्यजीव अनुसंधान के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकता है।
तकनीक और संरक्षण का अनोखा संगम
उत्तराखंड के जंगलों में शुरू हुई यह पहल तकनीक और प्रकृति संरक्षण के अनोखे संगम का उदाहरण है। AI की मदद से वन विभाग अब वन्यजीवों की निगरानी को अधिक सटीक, वैज्ञानिक और प्रभावी बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह परियोजना सफल रहती है तो भविष्य में इसे राज्य के अन्य वन क्षेत्रों और अभयारण्यों में भी लागू किया जा सकता है।